उसमें सब कुछ था

30-04-2012

उसमें सब कुछ था

संजीव बख्शी

आकंठ  विशेष कवि के रुप में  
सफेद से कुछ ही दूरी पर
पीला रहता था  

 

पौ फटने और सूर्योदय के बीच का फासला था
नीला और काला पीछे की लाईन में
रात की दूरी में रहते थे 

 

न सफेद कोई रंग था न नीला
रंग तो ये बहुत बाद में हुए
ये रहते थे
जैसे और सब रहते थे
जैसे हरा रहता था पेड़-पौधों में घर बनाकर
जैसे पारदर्शी था सर्वव्यापी
जैसे आवाज का उत्पन्न होना
उसका रहना था 

 

ब्रह्मांड के आँगन में था सब कुछ
पृथ्वी की गति थी पहाड़ पेड़ की गति 
यही था उनका चलना-फिरना 

 

मौसम था, इंद्रधनुष था,
बिना लिखी कविताएँ थी,
अपने आप कहानियाँ थी 

 

और अपने आप जो हो सकता था
वह सब कुछ था

 

अंधेरे के मायने सोना था
उजाले के जाग जाना
फूलों की भाषा खुशबू थी
क्लोरोफिल था पत्तियों की मुस्कान 

 

कुछ नहीं के बाद का संसार था
उसमें सब कुछ था ।

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