कोरोना की तरफ़

01-06-2020

कोरोना की तरफ़

सुमित दहिया

तरक्क़ी की करवटों से ऊपजे 
ठहराव में पुरानी परिभाषाओं के 
नए आयाम तलाश किये जा रहे हैं


बात करने, मुस्कुराने
कहकहे लगाने, हाथ हिलाने
घर और बाहर के हैंडल घुमाने
इन सबका अंदाज़ पूरी तरह बदल गया है
ये सभी एक तरफ़ घूम रहे हैं
"कोरोना की तरफ़"


एक आँख दूसरी वैश्विक आँख में 
केवल तनाव झाँक रही है 
चेहरों पर पर्यायवाची डर की बैचेनी पसरी है
ऐसे में और आशंकाएँ उभरती हैं
उस गंभीर मानवीय संकट की
जो दिन-प्रतिदिन भयावह हो रहा है
इतने शोर में कहीं कोई मौन रो रहा है


क्या तुम अब तक समझ नहीं पा रहे
तुम्हारे नंगेपन में एकत्रित अवकाश का नाम दुनिया है


अपने सुनहरे सुराखों से छनकर आ रही है
वह सजगता, जिसमें
कुछ मुनाफ़ाखोर अब भी
गिरती चीख़ों के ढेर पर 
आर्थिक छलाँगें लगा रहे हैं
अपने पलंग के पावे पर पासबुक बाँधकर
रंगीन समग्रता से देख रहे हैं
सेंसेक्स और निफ़्टी
और अगर ये कामयाब होते हैं
तो मैं यह कहने पर विवश हूँ
कि अपने काँपते बलगम में ये नाकाम व्यवस्था थूकेंगे


पहली बार दुनिया ने देखा है
'अमीरों को बीमारी' होती है
'अमीरों की बीमारी' होती है
यक़ीनन अँधेरा तेज़ी से फैलता है
दरिया राम की झोपड़ी में बेशक हैंडल न हो
लेकिन चूल्हे के पास पड़ी
बर्तनों की ठंडी राख में देखो
कुछ अख़बारों के जले हुए चीथड़े पड़े हैं
जिसमें बीमारी प्रतिदिन आँकड़े बदलती रहती थी
इस बीमारी के आँकड़ों पर सेक दी है
कौशल्या ने
'अरमानों की रोटी'


हाँ, यह वायरस बढ़ रहा है
तुम्हारी नसों के अंतरालों में
चौंकती ख़ामोशी के संतुलन के साथ
जंग लगे हुए आदेशों में
उन बस और रेल के तमाम ठिकानों में
चारों तरफ़ फैली विनाशकारी सामाजिकता में
यह निरंतर बढ़ रहा है हमारी देह और संदेह में
बिल्कुल उसी तरह
जैसे किसी ताज़ा चखने वाली औरत के सूट के 
हर धागे में बढ़ता है ठोस पसीना


याद रखना
मरा हुआ आदमी केवल एक आँकड़ा होता है
चाहे किसी भी क़द से क्यूँ न मरा हो


इटली और ईरान के चौराहों पर 
अबकी बार रक्तरंजित वसंत आया है
लगातार विलुप्त रहने वाले लोगों को 
अचानक अच्छा लगने लगा है
मई और जून का तपता भारत
वो चाहते है जल्दी उम्मीदों की लू चले
नहीं जानता
इस वैश्विक मासिकधर्म से कितने लोग बच पाएँगे
यह भी ठीक से नहीं कह सकता 
हर चाल में तुतलाहट भरने वाला कौन है
किसने पक्षी की आँख में झाँकने के लिए 
उसके घोंसले समेत पूरे दरख़्त में जैविक आग लगा दी


अगर तुम्हारी संक्रमित आदतों का
पहले लॉकडाउन हो जाता
या वक़्त रहते हो जाती मानवता की स्क्रीनिंग
तो आज ज़रूरत न पड़ती
सम्पूर्ण कायनात के मुँह पर व्यवस्था के मास्क की
आख़िर क्या दिया है
इस अंधाधुंध शहरीकरण ने
तुम्हारी बदलती जीवनशैली ने
गंदी बदबूदार बस्तियाँ
घटती भावनाएँ
छटपटाती दमित इच्छाएँ
हर पल में फैली हुई विचलित ख़ानाबदोशी
आख़िर क्या परिणाम है तुम्हारी मध्यवर्गीय समृद्धि का
जो बेशक धनी होती जा रही है
अक्सर मानवता का अंत ख़रीदकर ला रही है


बिस्तर के बीचों-बीच बनी
एक लकीर से निकलने वाले
गुप्तदान में हाथ को हाथ नहीं छूता
सारी दुनिया को गुप्तदान बनाने वाले
तुम ये कैसे भूल गए
किसी और के पास हो सकते हैं
तुम्हारे से भी विशाल जबड़े
क्या ताउम्र तुम लिफ़ाफ़ों में अंतड़ियाँ ढोते रहते
और जो पुकार नहीं सकते वे विलाप कर रोते रहते

 

महाविनाशकारी स्तनों से पोषित ऊर्जाविहीन उल्कापिंडो
ये एक समझ थी
जो अत्यधिक प्राचीन कुएँ के आसपास विकसित हुई थी
बाद में उस पर बुद्धिहीनता की घास उग आई
फिर निर्माण किये गए वहाँ दासता के महान खंडहर
अब कुआँ अपनी समझदारी के साथ
खाँस-खाँसकर ज़ोर मारता है
और खंडहर में बैठा हर आदमी
एक, दूसरे को निहारता है
और कहीं से एक ज़ख्मी आवाज़ आती है
रुको ना, रुको ना
हे महामृत्यु अब रुको ना।

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