ये कलकत्ता है यार

15-02-2025

ये कलकत्ता है यार

उपेन्द्र यादव (अंक: 271, फरवरी द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)


एक हाथरिक्शा इंतज़ार कर रहा है
एक अदद सवारी का
जो दो पहियों और दो हाथों से खींची जाएगी
अपने पूरे वज़न और अस्तित्व के साथ
इसी धरती की कोख को चीरकर
 
ये मिलने वाली सवारी सबसे क़ीमती है
इस दुनिया की किसी भी चीज़ से
 
ये महज़ एक सवारी नहीं है
बल्कि सूखी अतड़ियों में
रोटी की अन्तिम उम्मीद है
भूख का अन्तर्नाद है
ठंढे पड़ चुके चूल्हे की
फिर से धधकने वाली आग है
 
इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है कि
इसे जो दो हाथ खींचते हैं
वो अशक्त हैं, बूढ़े हैं
लाचार हैं, बीमार हैं
 
दरअसल बड़े शहरों के शोर में
छोटी-छोटी चीखें और पुकारें
कहीं गुम हो जाती हैं
जिन्हें कोई सुनना नहीं चाहता
 
कहाँ समय है किसी के पास
सुबुकती हुई आहों को
सुनने के लिए
 
लोग हैं
भीड़ है
शहर है
प्रतिस्पर्धा है
 
फिर असहायों के
उम्मीदों की गठरी
यूँ ही रौंद दी जाती है
भीड़ के पैरों तले
 
जिसकी घुघुवाती हुई आवाज़
शहर के कर्कश शोर में
कहीं विलुप्त हो जाती है
 
ऐसे शहर! 
लोगों की लाशों पर बनते हैं
और ‘सिटी ऑफ़ जॉय’ कहलाते हैं
 
ये कलकत्ता है यार! 
 
एक महान सभ्यता के दौर में
इंसान को जोत दिया गया है
कोलतार की सड़कों पर
और हम ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे हैं
मेरा भारत महान्
विश्वगुरु, विश्वगुरु
कोलकाता, कोलकाता। 

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