विवाह प्रमाण-पत्र
विनय कुमार
दो महीने की छुट्टी काटने के बाद आज जहाज़ (भारतीय नौसेना पोत मकर) पर मेरा पहला दिन था। सुबह की सभा जहाज़ के क्वार्टर डेक (जहाज़ का पिछला खुला हिस्सा) पर शुरू हो चुकी थी। कमानाधिकारी के आते ही सभी अफ़सर और नाविक सावधान खड़े हो गए। मासाहब ने सभा की कार्यवाही शुरू की। सभा के अंत में जाने से पहले कमान अधिकारी ने मुझे शादी की बधाई दी। मैंने भी मिठाई का डिब्बा उनकी तरफ़ बढ़ा दिया। सबने मुझे बधाई दी और मिठाई खाई।
सब ख़त्म होने के बाद में अपने विभाग में गया। मासाहब ने मुझे वहाँ से सीधा जहाज़ के विनियमन कार्यालय भेज दिया। मुझे अपनी पत्नी का नाम अपने सेवा अभिलेख पुस्तिका में दर्ज कराना था। विनियमन कार्य पहुँच कर मैंने अपने सारे दस्तावेज़ वहाँ बैठे नौसेना पुलिस के पेटी ऑफ़िसर को दिए। सारे दस्तावेज़ों की जाँच करने के बाद पेटी ऑफ़िसर मुझसे बोला, “सारे दस्तावेज़ सही हैं, केवल विवाह प्रमाण पत्र को छोड़कर। आप पंचायत सेक्रेटरी से ही विवाह प्रमाण पत्र लेकर आए हैं। लेकिन यहाँ हमें विवाह रजिस्ट्रार अधिकारी का प्रमाण पत्र चाहिए। घर पर फोन करके किसी को बनाने को बोल दो फिर अगली बार छुट्टी जाओगे तो तब लेते आना।” मैंने सहमति में सिर हिला दिया।
सात महीने बाद मुझे छुट्टी मिली। घर पहुँच कर अगले दिन ही मेरा जो लक्ष्य था वह था—विवाह रजिस्ट्रार अधिकारी से विवाह प्रमाण पत्र बनवाना। मेरा चचेरा भाई सरकारी वकील है। मैंने उसे फोन किया और सारी बात बताई। वह बोला, “विवाह रजिस्ट्रार अधिकारी शायद मंडी (मेरे ज़िले का नाम) बैठता है। लेकिन बाक़ी फ़ौजी भी विवाह प्रमाण पत्र बनाते हैं, वे एसडीएम से बनवाते हैं।”
मैंने अपने जहाज़ में फोन किया। उन्होंने बताया कि एसडीएम ही विवाह रजिस्ट्रार अधिकारी होता है। एक घंटे बाद में सरकाघाट (मेरे उपमंडल का नाम) लघु सचिवालय पहुँच गया। तब मैंने एक वकील को विवाह प्रमाण पत्र बनवाने के लिए बोला। वह बोला कि दो हज़ार रुपये लगेंगे। मैंने मना कर दिया। वह बोला एक हज़ार में कर दूँगा। फिर आठ सौ रुपये में सौदा तय हुआ। उसने दस मिनट में ही सारे काग़ज़ पत्र तैयार कर लिए। फिर हम एसडीएम कार्यालय में उनके सहायक के पास पहुँचे। उसने हमारे काग़ज़ पत्र देखकर एक पुराना विवाह प्रमाण पत्र हमें दिखाते हुए कहा कि यह बीडीओ (खंड विकास अधिकारी) से भी प्रतिहस्ताक्षर कराना पड़ेगा।
वकील ने पूछा, “यह नई चीज़ शुरू हुई क्या? इसमें वीडीओ साहब की क्या भूमिका है? मैं सब से बात करता हूँ।” वकील मुझे लेकर एसडीएम के पास पहुँच गया। एसडीएम बोले, “हाँ, बीडीओ के प्रति हस्ताक्षर कराने पड़ेंगे।” वकील ने बिना बीडीओ के हस्ताक्षर के प्रमाण पत्र बनाने का बड़ा अनुरोध किया पर वह न माना। तब मैंने एसडीएम से कहा, “हिमाचल प्रदेश में बाक़ी उपमंडलों में तो ऐसा नहीं हो रहा। आप सुजानपुर से यहाँ स्थानांतरित होकर आए हैं। क्या वहाँ भी ऐसा होता था? मैं सरौण पंचायत से हूँ। यह सरकाघाट और धर्मपुर की सीमा पर स्थित है। मेरा विकास खण्ड धर्मपुर है और तहसील सरकाघाट। सरकाघाट से धर्मपुर चालीस कि.मी. दूर है। अब मैं यहाँ से धर्मपुर प्रति हस्ताक्षर के लिए अस्सी कि.मी. जाऊँगा तो मेरी तो दिहाड़ी मर जाएगी। फिर बीडीओ के प्रति हस्ताक्षर की सरकार की कोई नोटिफ़िकेशन भी नहीं है।”
एसडीएम अड़ गया, “मुझे किसी चीज़ से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। प्रति हस्ताक्षर कराके आओगे, तभी मैं विवाह प्रमाण पत्र बनाऊँगा।”
मैं ग़ुस्से से वहाँ से चला गया। मैंने ग़ुस्से में वकील से कहा कि मैंने आपको आठ सौ रुपए किस चीज़ के दिए हैं।
सरकाघाट से दो घंटे में मैं धर्मपुर पहुँच गया। मैंने चपरासी से बात की। चपरासी बीडीओ के पास गया। बीडीओ साहब अपने कम्प्यूटर पर वीडीयो सम्मेलन में व्यस्त थे। उन्होंने मिलने से मना कर दिया। आधा घंटा ऑफ़िस के बाहर खड़ा होने के बाद मैं अंदर चला गया और बीडीओ साहब से अनुरोध किया कि एक मिनट के लिए मेरी बात सुनें। बीडीओ ने मेरी पूरी बात ध्यान से सुनी। उसने मुझे पंचायत निरीक्षक के पास भेज दिया। पंचायत निरीक्षक ने भी बड़े ध्यान से मेरी बात सुनी। उसने बीडीओ साहब को फोन करके बोला कि वे प्रतिहस्ताक्षर कर दें। मैं दोबारा बीडीओ साहब के पास पहुँच गया। बीडीओ ने एसडीएम धर्मपुर को फोन किया और सारी बात बताई। एसडीएम धर्मपुर बोले कि ऐसा कुछ भी नहीं है। आपके हस्ताक्षर की कोई आवश्यकता नहीं है। मैं भी तो यहाँ विवाह प्रमाण पत्र बना रहा हूँ। फिर बीडीओ ने एसडीएम सरकाघाट को फोन किया। तब तक एसडीएम सरकाघाट ने अपने दोस्तों से पता कर लिया था कि बीडीओ के प्रति हस्ताक्षर की ज़रूरत होती है कि नहीं। वह फोन पर प्रति हस्ताक्षर के बारे में मुकर गया। वह बोला कि इसने जो सर्टिफ़िकेट लगा रखे हैं वे फोटो स्टेट हैं और स्वप्रमाणित हैं। मुझे असली सर्टिफ़िकेट चाहिए।
तब मैं बोला कि ऑनलाइन आपकी साइट पर विवाह प्रमाण पत्र बनवाने के जो दिशानिर्देश हैं उनमें स्वप्रमाणित फोटोस्टेट कॉपी की ही माँग की गई है। आजकल जब ट्रैफ़िक पुलिसवाला किसी गाड़ी को रोकता है तो ड्राइवर को गाड़ी के दस्तावेज़ दिखाने की ज़रूरत नहीं होती। पुलिसवाले को गाड़ी का नंबर देखकर अपने रिकार्ड में दस्तावेज़ देखने होते हैं। ऑनलाइन इंटरनेट के इस युग में फोटोस्टेट से सर्टिफ़िकेट नंबर देखकर, सर्टिफ़िकेट की सत्यता को स्वयं जाँचना होता है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में आप काला काग़ज़ ढूँढ़ रहे हैं।
एसडीएम साहब बोले कि मुझे असली सर्टिफ़िकेट ही चाहिए। अब मेरे सामने एक अलग समस्या खड़ी हो गई। विवाह प्रमाण पत्र की कॉपी, जो मुझे पंचायत सचिव ने दी थी वह पीडीएफ़ में थी। बीडीओ साहब बोले की पीडीएफ़ की ब्लैक एंड व्हाइट की जगह रंगीन प्रिंट निकाल लो। परिवार रजिस्टर की जो नक़ल थी वह ऑनलाइन पीडीएफ़ की प्रिंट कॉपी होनी चाहिए थी जिस पर पंचायत सचिव की स्टैंप और हस्ताक्षर होने चाहिए थे। परन्तु सरौण पंचायत में पिछले पाँच महीने से सचिव ने कोई ऑनलाइन काम नहीं किया था। उसने मुझे हाथ से लिखी कॉपी दी थी जिसे मैंने दूसरी जगह जमा कर दिया था। बीडीओ साहब बोले कि मैं सचिव को फोन कर देता हूँ, वह आज ही तुम्हें दूसरी कॉपी दे देगा।
मैंने ऑफ़िस से बाहर आकर सचिव को फोन किया तो वह बोला कि वह आज पंचायत नहीं आ पाएगा। वहीं पास में धर्मपुर के विधायक का ऑफ़िस था। मैंने विधायक को यह बात बताई। विधायक ने बीडीओ को फोन किया। फिर तय हुआ कि सचिव परसों पंचायत में आएगा। जब परसों मैं पंचायत गया तो वहाँ प्रधान से पता चला कि वह मेडिकल लीव (चिकित्सा छुट्टी) पर चला गया है। अब एक सप्ताह तक पंचायत में कोई सचिव नहीं आने वाला। दस महीने बाद मैं दोबारा छुट्टी जा रहा हूँ। शायद इस बार मेरा विवाह प्रमाण पत्र बन जाए।