सुविधाओं के युग में असुविधाओं का दैनिक पंचांग
प्रो. आरके जैन ‘अरिजीत’
[दिनचर्या: एक संगठित अव्यवस्था का जीवंत दस्तावेज]
[हम जी नहीं रहे, बस सिस्टम हैंग होने से बचा रहे हैं]
सुबह अब सूरज की कोमल आहट से नहीं, मोबाइल की तीखी ध्वनि से होती है, जो नींद से अधिक भीतर एक अनाम खीझ जगा देती है। जैसे ही अलार्म गूँजता है, हम पल भर को स्वयं को अनुशासन का आदर्श मानने लगते हैं, लेकिन तभी नोटिफ़िकेशनों की भीड़ हमारी सजगता को धक्का देकर गिरा देती है और आत्मगौरव चुपचाप कोने में सिमट जाता है। हम स्क्रीन पर बिखरी व्यर्थताओं को समेटने का दिखावा करते हैं, जबकि सच में समेटने योग्य हमारी टालमटोल की आदत होती है। चार्जर घर में उतने ही होते हैं जितनी रिश्तों में तकरार—हर कोने में दिखाई देते हैं, पर आवश्यकता के समय ओझल हो जाते हैं। तकनीक ने हमें समय बचाने का सपना दिखाया था, पर अब वही हर क्षण का हिसाब हमसे सख़्ती से वसूल रही है।
नहाने का समय अब शुद्धि से कम, सहनशक्ति की परीक्षा अधिक बन गया है। शॉवर कभी ऐसा निस्तेज बहाव देता है कि ठंड-गरमी का भेद ही मिट जाए, और कभी इतनी अनिश्चित धार छोड़ता है कि समझ ही न आए शरीर कैसे प्रतिक्रिया करें। तौलिया ठीक उसी दिन ग़ायब होता है जब हमें सबसे अधिक जल्दी होती है। बाथरूम की बाल्टी और मग भी ऐसे बर्ताव करते हैं जैसे किसी मौन साज़िश में शामिल हों। हम पानी बचाने की प्रतिज्ञा करते हैं, पर नल खुला छोड़कर अपनी ही सोच बहा देते हैं। यह स्वच्छता नहीं, हालात के आगे हमारी हार का रोज़ाना स्नान है।
नाश्ते की मेज़ पर अब स्वाद से अधिक संदेह परोसा जाता है। चाय बनाते हैं तो दूध इतना कम होता है कि लगता है भैंस ने भी महँगाई के ख़िलाफ़ हड़ताल कर दी है। बिस्कुट डुबोते ही कप में शहीद हो जाता है, मानो उसने जीवन के संघर्ष से तंग आकर आत्मसमर्पण कर दिया हो। गैस चूल्हा उस दिन धीमा पड़ता है जब समय तेज़ भाग रहा होता है। हम हेल्दी खाने की क़सम खाते हैं और पराँठे पर मक्खन ऐसे लगाते हैं जैसे राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रहे हों। रसोई अब प्रयोगशाला नहीं, उम्मीदों का पोस्टमार्टम हाउस बन चुकी है।
घर से निकलते वक़्त जूते की जोड़ी भी हमारे ख़िलाफ़ साज़िश करती है—एक मिलता है, दूसरा ध्यान साधना में लीन रहता है। घड़ी की सूइयाँ उस समय सबसे तेज़ दौड़ती हैं जब हमें सबसे धीमे चलना चाहिए। बैग में ज़रूरी काग़ज़ कभी नहीं मिलते, पर बेकार रसीदें वर्षों से अडिग खड़ी रहती हैं। बाहर निकलते ही ऑटो वाला ऐसे मना करता है जैसे हमने उससे उधार माँग लिया हो। ट्रैफ़िक सिगनल पर खड़े होकर हम जीवन के दर्शन करते हैं, पर जैसे ही हरा होता है, पीछे वाला हॉर्न बजाकर दर्शन का अंतिम संस्कार कर देता है।
दफ़्तर पहुँचते ही कुर्सी हमें अपना नहीं मानती, पर कंप्यूटर तुरंत पहचान लेता है—“पासवर्ड ग़लत।” हम तीन बार कोशिश करते हैं और हर बार आत्मविश्वास थोड़ा-थोड़ा झरता जाता है। प्रिंटर का मिज़ाज सरकारी बाबू जैसा होता है—चलना तभी चाहता है जब उसे बिल्कुल न चलना हो। मीटिंग में हम सिर हिलाते रहते हैं, क्योंकि समझने से आसान है सहमति जताना। एक्सेल शीट में नंबर ऐसे उलझते हैं जैसे रिश्तों में ग़लतफ़हमियाँ। काम कम और प्रदर्शन ज़्यादा होता है, और अंत में हम “प्रोडक्टिव” होने का स्क्रीनशॉट लेकर ख़ुद को तसल्ली दे देते हैं।
शाम को घर लौटते समय थकान शरीर से कम, मन पर ज़्यादा बोझ बनकर उतरती है। ऑनलाइन दुनिया हमें सुकून के सपने दिखाती है, पर बदले में चैन की किश्तें वसूलती रहती है। टीवी का रिमोट ठीक उसी पल ग़ायब होता है जब मनपसंद कार्यक्रम शुरू हो। आसपास का शोर हमारी ख़ामोशी को ऐसे कुतरता है जैसे सन्नाटे की भी अपनी कोई क़ीमत वसूली जा रही हो। हम सोशल मीडिया पर ख़ुशियाँ साझा करते हैं, ताकि ख़ुद को ही यक़ीन दिला सकें कि हम सचमुच ख़ुश हैं। यह विश्राम नहीं, दिनभर की विडंबनाओं का सांध्य संस्करण है।
रात को बिस्तर पर जाते ही नींद हमसे कतराने लगती है, जैसे उसे भी हमारी संगति पर भरोसा न हो। दिमाग़ दिनभर की तुच्छ घटनाओं का हिसाब माँगता रहता है, और हम बिना जवाब दिए सोने का अभिनय करते हैं। फोन चार्ज पर लगा होता है, पर हम भीतर से ख़ाली ही रहते हैं। कल बेहतर होगा, इस भरोसे पर हम आज की उलझनों को माफ़ कर देते हैं। यही हमारी दिनचर्या का निचोड़ है—हर दिन नई उम्मीद, और वही पुरानी पेचीदगियाँ। आधुनिक जीवन ने हमें सुविधा का सपना दिखाया है, पर सच में हम रोज़मर्रा की हास्यास्पद कठिनाइयों के स्थायी किरायेदार बन चुके हैं।