समाधि की नई विधि—स्क्रीन पर झुकी हुई गर्दन
प्रो. आरके जैन ‘अरिजीत’
[नोटिफिकेशन का युग: जहाँ प्रतिक्रिया ही साधना है]
[मनुष्य का नया आश्रम: छह इंच की स्क्रीन की साधना]
हमारे देश में महापुरुषों की परंपरा सदियों पुरानी रही है। कभी महात्मा बनने के लिए घर-द्वार छोड़कर जंगलों में तपस्या करनी पड़ती थी; वर्षों साधना के बाद कहीं ज्ञान की झलक मिलती थी। पर आधुनिक युग ने यह साधना सरल कर दी है। पहले ऋषि-मुनि पीपल या बरगद के नीचे समाधि लगाते थे, आज लोग बस स्टैंड, चौराहों और बाज़ारों के बीच मोबाइल में ऐसी तल्लीनता से डूब जाते हैं कि आसपास की दुनिया जैसे मिट जाती है। सामने से ट्रक निकल जाए या कोई पुकारता रह जाए—ध्यान टस से मस नहीं होता। इतनी अडिग एकाग्रता योगशास्त्रों में भी दुर्लभ है। इसलिए मुझे विश्वास है कि भविष्य में योग की नई विधा जन्म लेगी—“मोबाइल योग”, जिसमें साधक अँगूठे के आसन में बैठकर ज्ञान प्राप्त करेगा।
पहले मनुष्य की सुबह बड़ी पवित्र होती थी। लोग उठते ही जल पीते, सूर्य को प्रणाम करते और ईश्वर का स्मरण करते थे। अब सुबह का पहला संस्कार बदल गया है—आँख खुलते ही हाथ मोबाइल की ओर बढ़ जाता है। उसे जानने की उत्सुकता रहती है कि रात भर में दुनिया ने उसके बारे में क्या सोचा, किसने उसकी तस्वीर पर मुस्कान भेजी और किसने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया। कुछ संदेश मिल जाएँ तो मन प्रसन्न हो जाता है, और न मिलें तो लगता है जैसे संसार ने उपेक्षा कर दी हो। प्रार्थना में धैर्य चाहिए, पर मोबाइल में प्रतिक्रिया तुरंत मिल जाती है; इसलिए आज का मनुष्य धैर्य की साधना छोड़कर प्रतिक्रिया के प्रसाद से ही संतुष्ट हो जाता है।
एक सुबह मैंने देखा कि पड़ोसी मोबाइल में इतनी गहरी डूबे हैं कि मानो कोई पुराना ग्रंथ पढ़ रहे हों। मैं हँसते हुए पूछ बैठा, “क्यों, नया शोध कर रहे हो?” उन्होंने सिर हिलाते हुए कहा, “देश-दुनिया की हलचल पढ़ रहा हूँ।” मैंने कहा, “इतनी हलचल जानने से क्या फ़ायदा?” वे मुस्कुराए और बोले, “दुनिया सुधरे या न सुधरे, कम से कम मन को संतोष मिलता है—हर जगह गड़बड़ी बराबर है।” तभी मुझे लगा, मोबाइल ने हमारे दृष्टिकोण को ही बदल दिया है—दूसरों की उलझनों को देखकर अपनी परेशानियाँ हल्की लगने लगती हैं। पहले लोग संतों के प्रवचन सुनकर संतोष पाते थे, अब सोशल मीडिया देखकर।
मोबाइल ने समाज को ज्ञानियों से भर दिया है। पहले किसी विषय पर राय देने से पहले लोग झिझकते थे, डर रहता था कि कहीं कोई सचमुच का जानकार सामने न आ जाए। अब यह डर ख़त्म हो गया है। एक दिन मैंने देखा कि एक सज्जन बड़े आत्मविश्वास से अपने विचारों की जादुई गंगा बहा रहे थे। मैंने पूछा, “यह सब अनुभव कहाँ से आते हैं?” वे मुस्कुराए और बोले, “अनुभव तो थोड़ा-बहुत है, बाक़ी सब मोबाइल की ताक़त है—जब हाथ में यह है, तो सोच की कोई सीमा नहीं रहती।” मुझे लगा, मोबाइल ने लोकतंत्र को इतना व्यापक बना दिया है कि हर नागरिक अपने आप में चलता-फिरता नीति आयोग बन गया है।
घर-परिवार के जीवन में भी मोबाइल ने अद्भुत शान्ति ला दी है। पहले शाम को लोग आँगन में बैठकर दिनभर की बातें और हँसी-मज़ाक करते थे। अब दृश्य ऐसा है मानो चार साधक मौन साधना कर रहे हों—सभी के सिर झुके और उँगलियाँ स्क्रीन पर चलती रहती हैं। बच्चे पहले दादी से कहानियाँ सुनते थे, अब छोटी-छोटी वीडियो से ज्ञान ले लेते हैं। मैंने एक बच्चे से पूछा, “बड़े होकर क्या बनना चाहते हो?” उसने कहा, “इन्फ़्लुएंसर।” मैंने पूछा, “यह कैसा पेशा है?” उसने कहा, “जहाँ ख़ुद कम मेहनत करते हैं, पर दूसरों को बताते रहते हैं कि क्या करना चाहिए।” लगा, पुरानी परंपरा अब बस नया नाम पा गई है।
रिश्तों पर भी मोबाइल का बड़ा असर हुआ है। पहले हाल पूछने घर जाना पड़ता था, अब तस्वीर देखकर ही समझ लिया जाता है कि सामने वाला ख़ुश है या दुखी। शादी हो जाए तो पहला सवाल: ‘फोटो भेजना’—जैसे यही शादी की असली पुष्टि हो। एक बार परिचित अस्पताल में एडमिट थे। मित्र उससे मिलने आए, लेकिन अधिक समय मोबाइल कैमरे का कोण ठीक करने में लगा। एक ने कहा, “चेहरा सीधा करो, तस्वीर साफ़ आएगी।” परिचित बोले, “भाई, तकलीफ़ हो रही है।” मित्र ने कहा, “तकलीफ़ तो रहेगी, पर फोटो अच्छी होनी चाहिए।” तभी मुझे लगा, आधुनिक संवेदना का अर्थ है—दुख में भी फ़्रेम सही होना चाहिए।
मोबाइल ने मनुष्य को अद्भुत स्वतंत्रता दी है—बिना मेहनत के महान बनने की। अब कोई घर बैठे समाज सुधारक, देशभक्त या दार्शनिक बन सकता है; बस कुछ तीखी टिप्पणियाँ लिखिए और आत्मसंतोष मिल जाता है। मैंने देखा एक युवक दिन भर प्रेरक वीडियो देख रहा था। मैंने पूछा, “तुम ख़ुद क्या कर रहे हो?” बोला, “मैं तो बस सीख रहा हूँ, असली फ़ैसला तो डिजिटल दुनिया करेगी।” लगा, अगर पुराने संत आज होते तो तपस्या के लिए पहाड़ नहीं, बल्कि अच्छी सिगनल वाली जगह चुनते। ज्ञान अब शायद पेड़ के नीचे नहीं, मोबाइल टॉवर की छाया में मिलता। और सच यही है—मोबाइल ने दुनिया से तो जोड़ा, पर सोचने की आदत छीन ली; अब असली साहस है, स्क्रीन बंद कर ख़ुद को आज़माना।