अव्यवस्था: जो कभी नहीं बदलती, इसलिए सबसे भरोसेमंद है
प्रो. आरके जैन ‘अरिजीत’
[दिन नहीं बदलते, बस मुश्किलों के चेहरे बदलते हैं]
[एक ऐसा सफ़र, जहाँ मंज़िल नहीं—बस चलते रहने की मजबूरी है]
भारत में अब एक अनोखा उत्सव प्रचलन में है—“सामान्य अव्यवस्था दिवस।” यह हर दिन मनता है, अवकाश नहीं मिलता, और इसमें सबकी अनिवार्य भागीदारी होती है। सुबह आँख खुलते ही इसका आरंभ हो जाता है। बिजली जाते ही मानो उद्घोष हो जाता है—उत्सव शुरू। पंखा थमते ही गर्मी अपना अधिकार जता देती है। घर से बाहर क़दम रखो तो सड़क का गड्ढा मुस्कुराता मिलता है—जैसे निमंत्रण दे रहा हो, “आओ, आज तुम्हारा संतुलन यहीं परखा जाएगा।”
सब कुछ होते हुए भी जब इंसान ख़ुद को “ज़रूरी” साबित करने लगे, तो समझिए वक़्त बदल चुका है। एक युवक मिला। बोला, “भैया, मैं 24 का हूँ, पैनिक अटैक आ रहा है।” मैंने पूछा, “क्यों?” बोले, “कल इंटरव्यू दिया। कंपनी बोली, ‘हम एआई यूज़ करेंगे, तुम्हारी ज़रूरत नहीं।’ मैंने कहा, ‘सर, मैं इंसान हूँ, क्रिएटिव हूँ।’ बोले, ‘क्रिएटिविटी अब एआई करती है, सस्ती पड़ती है।’ “ अरे भाई, पहले नौकरी नहीं मिलती थी क्योंकि डिग्री नहीं थी। अब डिग्री है, लेकिन एआई कहता है, “तुम पुराना मॉडल हो।”
और अब महँगाई की कहानी—सब्ज़ी ख़रीदो तो जेब हल्की, दाल लो तो सोच गहरी, और चावल तो जैसे ख़ास मौक़ों की चीज़ बन गया। अब हाल यह है कि रसोई शुरू करने से पहले ही हिसाब लगाना पड़ता है कि आज क्या “छोड़ना” है। घर का बजट भी अजीब पहेली बन गया—खाना, किश्त, और ‘मन का बोझ’। खाना बनाओ तो ख़र्च बढ़े, किश्त भरो तो हाथ ख़ाली, और जब दोनों निभाओ तो मन भारी। फिर इलाज के नाम पर वही सलाह—“फिक्र मत करो, बस डॉक्टर की फ़ीस पहले जमा करो।”
और जलवायु का हाल तो और निराला है—अब मौसम बदलता नहीं, सीधे चढ़ बैठता है। सुबह की ठंडक कहीं गुम हो गई, दिन चढ़ने से पहले ही तपन अपना असर दिखाने लगती है। पानी की स्थिति ऐसी कि नल उम्मीद जगाता है और ख़ाली ही रह जाता है, टैंकर दिखते ही भीड़ उमड़ पड़ती है। हवा भी अब सुकून नहीं देती—चेहरे से टकराए तो ताज़गी नहीं, थकान छोड़ जाती है। कई लोग कहते हैं कि बाहर निकलते ही साँस भारी लगने लगती है, जैसे वातावरण ने ही दम घोंट दिया हो। बचाव की बात करो तो वही जवाब—“सुरक्षा भी अब सोच-समझकर करनी पड़ती है, क्योंकि हर उपाय जेब पर भारी पड़ता है।”
फिर सिविक सेंस। वो तो जैसे काल्पनिक चीज़ है। सड़क पर थूक दो, कूड़ा फेंक दो, गाड़ी ग़लत पार्क कर दो—कोई नहीं टोकता। लेकिन अगर कोई टोके तो गुस्सा, “अरे भाई, देश आज़ाद है!” हाँ, आज़ादी है–कूड़ा फेंकने की, नियम तोड़ने की, लेकिन ज़िम्मेदारी लेने की नहीं। एक बार मैंने किसी से कहा, “भाई, कूड़ा डस्टबिन में डाल दो।” बोला, “डस्टबिन कहाँ है?” मैंने कहा, “वो जो तुम्हारे सामने है।” बोला, “अरे वो तो भरा हुआ है।” यानी समाधान नहीं, बहाना चाहिए—और बहाने के आगे पूरी सड़क ही कचरा-पात्र बन जाती है।
हमारे यहाँ अब दो तरह के लोग हैं। एक वे जो रोज़ सुबह उठकर लड़ते हैं—ट्रैफ़िक से, महँगाई से, बेरोज़गारी से, गर्मी से। और एक वे जो कहते हैं, “भारत विश्व गुरु बन रहा है।” हाँ, बन रहा है—लेकिन गुरु बनने से पहले शिष्य को जीने तो दो। शिष्य रोज़ कहता है, “गुरु जी, नौकरी दो।” गुरु जी कहते हैं, “जीडीपी बढ़ रहा है।” शिष्य कहता है, “उधर तरक़्क़ी के आँकड़े उड़ान भर रहे हैं, और इधर मेरी जेब में बस ख़ालीपन ही विस्तार पा रहा है।”
और स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल—बीमारी आए नहीं कि अस्पताल की क़तारें स्वागत को तैयार। जाँच इतनी कि बीमारी से पहले जेब थक जाए, दवाएँ ऐसी कि इलाज से ज़्यादा ख़र्च का दर्द हो। एक ही रोग पूरे परिवार की आर्थिक सेहत बिगाड़ देता है। काग़ज़ों पर आयुष्मान भारत जैसी योजनाएँ मज़बूत सहारे का भरोसा देती हैं, पर हक़ीक़त की दहलीज़ पर पहुँचते ही स्वर बदल जाता है—हक़ तो दर्ज है, मगर उसे निभाने में ढील साफ़ दिखती है; सुविधा आधी मिलती है, पर बिलिंग पूरी ही नहीं, अक्सर बराबर से भी ऊपर कर दी जाती है।
अब आरंभ कीजिए उस अनकहे उत्सव का, जो बिना बुलावे हर दिन जीवन में उतर आता है—“सामान्य अव्यवस्था।” न इसका अंत तय, न कोई विश्राम; यह तो बस चलता रहता है, और हम सब इसमें अपनी-अपनी भूमिका निभाते रहते हैं। आज सब कुछ सहज लगे तो मान लीजिए, कल का दृश्य और अधिक ‘विशेष’ होने वाला है। तब तक चेहरे पर सामान्य-सी मुस्कान बनाए रखिए और हालात के साथ चलते रहिए—कोई हाल पूछे तो बस इतना कह दीजिए, “सब चल रहा है, अव्यवस्था के साथ समझौता कर लिया है।”