सुनहरी बालों वाली लड़की
डॉ. राजकुमारी शर्मा
शहर की सुबहें हमेशा एक जैसी होती थीं—धुँधली, भागती हुईं, और अपने भीतर अनगिनत अनकही कहानियाँ लिए हुए। लेकिन उस दिन कुछ अलग था। शायद हवा में कोई नया एहसास घुला हुआ था, या शायद यह सिर्फ़ आर्यन के भीतर की बेचैनी थी, जो हर चीज़ को नया बना रही थी। वह रोज़ की तरह अपने ऑफ़िस जाने के लिए मेट्रो स्टेशन पर खड़ा था, मगर आज उसकी नज़रें भीड़ में किसी को ढूँढ़ रही थीं, जिसे वह जानता तक नहीं था। तभी उसकी नज़र उस पर पड़ी—सुनहरी बालों वाली लड़की, जो भीड़ के बीच भी अलग दिख रही थी, जैसे किसी बंजर ज़मीन पर अचानक लहराती फ़सल उभर आई हो।
वह लड़की साधारण कपड़ों में थी—हल्के नीले रंग का सूट और सफ़ेद सलवार पर एक छोटा-सा बैग—मगर उसके बालों की सुनहरी चमक और चेहरे की सादगी में एक अजीब-सा खिंचाव था। वह किताब में खोई हुई थी, जैसे दुनिया से उसका कोई लेना-देना ही न हो। आर्यन ने पहली बार किसी अनजान को इस तरह देखा था—बिना किसी वजह के फिर भी जैसे उससे उसका कोई गहरा रिश्ता हो। उसके दिल में एक हल्की-सी हलचल हुई, जो धीरे-धीरे बढ़ने लगी, जैसे शांत झील में कोई कंकड़ गिरा हो और लहरें फैलती चली जा रही हों।
मेट्रो आई, भीड़ बढ़ी, और सब अंदर जल्दी-जल्दी घुसने लगे। आर्यन भी उसी भीड़ का हिस्सा बन गया, मगर उसकी निगाहें उस लड़की पर ही टिकी थीं। वह सामने खड़ी थी, एक हाथ में उसके मोबाइल था जिसमें वह कुछ देख रही थी और दूसरे हाथ में किताब थी। आर्यन ने कोशिश की कि वह ख़ुद को सँभाले, मगर उसका मन बार-बार उसी तरफ़ खिंच रहा था। उसने सोचा और मेट्रो में ही उस लड़की को देख सबके बीच में कह दिया, “आपने बालों में जो कलर करवाया है। वह आपके ऊपर बहुत ही सुंदर लग रहा है।” लड़की घबराई और शरमा कर वहाँ से चली गई। आर्यन को महसूस हुआ कि यह सिर्फ़ एक पल का आकर्षण है, या कुछ और? मगर जवाब उसके पास नहीं था।
अगले दिन भी वह उसी समय, उसी जगह पर खड़ा था—जैसे अनजाने में ही उसने एक आदत बना ली हो। और फिर, जैसे किसी कहानी का दोहराव हो, वह लड़की फिर से वहीं थी। इस बार उसने हल्का-सा मुस्कुराते हुए अपनी किताब बंद की और इधर-उधर देखा। एक पल के लिए उसकी नज़र आर्यन से टकराई, और दोनों ने तुरंत ही अपनी-अपनी नज़रें हटा लीं। मगर उस एक पल में जो हुआ, वह शब्दों में बयान करना बड़ा मुश्किल था। दिन बीतते गए, और यह रोज़ का सिलसिला बन गया। दोनों एक-दूसरे को देखते, मगर कभी बात नहीं करते। उनके बीच सिर्फ़ नज़रों का रिश्ता था—एक ख़ामोश रिश्ता, जो हर दिन थोड़ा-थोड़ा गहरा होता जा रहा था। आर्यन अब हर सुबह का इंतज़ार करता था, सिर्फ़ इसलिए कि वह उसे देख सके। उसने कभी सोचा नहीं था कि किसी अनजान के लिए उसके दिल में इतनी जगह बन जाएगी।
एक दिन अचानक वह लड़की नहीं आई। आर्यन ने पूरी भीड़ को छान डाला, मगर वह कहीं नहीं थी। उस दिन मेट्रो का सफ़र बहुत लंबा और उदासीन लगा, और ऑफ़िस में भी वह परेशान रहा। उसका फोन भी नहीं लग रहा था। उस दिन उसे पहली बार एहसास हुआ कि वह सिर्फ़ एक अजनबी नहीं थी—वह उसकी आदत बन चुकी थी, उसकी दिनचर्या का महत्त्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थी। अगले कुछ दिन भी ऐसे ही बीते—बिना उसके। आर्यन हर दिन उसी जगह खड़ा रहता, मगर हर बार निराश होकर लौटता। उसके भीतर एक अजीब-सा ख़ालीपन घर करने लगा था। उसने ख़ुद से सवाल किया, “क्या यह प्यार है?” मगर फिर ख़ुद ही जवाब दिया, “नहीं, यह कैसे हो सकता है? मैं उसे जानता तक नहीं।” मगर दिल मानने को तैयार नहीं, उसका एहसास जीने नहीं दे रहा था।
फिर एक दिन, अचानक, वह सामने थी। वही सुनहरी बाल, वही सादगी, वही किताब—जैसे कुछ बदला ही न हो। आर्यन के चेहरे पर अनायास ही मुस्कान आ गई। उस दिन उसने ठान लिया कि वह अपने प्यार का एहसास उसे करवाकर रहेगा। मेट्रो में चढ़ने के बाद उसने हिम्मत जुटाई और धीरे से उसके पास गया।
“हाय,” उसने कहा, आवाज़ में हल्की-सी झिझक थी।
लड़की ने किताब से नज़र उठाई और मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “हाय।”
“मैं . . . मैं तुम्हें रोज़ देखता हूँ यहाँ,” आर्यन ने कहा, जैसे शब्द ख़ुद-ब-ख़ुद निकल रहे हों।
लड़की ने हल्का-सा सिर हिलाया, “मैं भी।”
बस इतना ही, मगर इस ‘मैं भी’ में एक पूरा एहसास था—एक स्वीकार, एक पहचान।
उसका नाम आयरा था। वह एक ग्राफिक डिज़ाइनर थी, और किताबें पढ़ना उसे बहुत पसंद था। धीरे-धीरे उनकी बातें बढ़ने लगीं—पहले मेट्रो तक, फिर कॉफ़ी तक, और फिर उन लंबी सैरों तक, जहाँ समय का कोई हिसाब नहीं रहता। उसने उसका फोन नंबर भी जैसे-तैसे जुगाड़ कर लिया था। पहले-पहल एक आदि बार कॉल किया और फिर लगातार ही बात करने का सिलसिला शुरू हो गया। आर्यन को अब हर चीज़ में आयरा नज़र आने लगी थी। उसकी हँसी, उसकी बातें, उसकी सोच—सब कुछ जैसे उसके दिल में बस गया था। आयरा भी बदल रही थी—वह अब पहले से ज़्यादा खुली हुई, ज़्यादा ख़ुश दिखने लगी थी। दोनों के बीच का रिश्ता अब सिर्फ़ नज़रों तक सीमित नहीं रहा था, वह एक गहरी दोस्ती में बदल चुका था, जिसमें कहीं न कहीं प्यार की ख़ुशबू भी थी।
मगर हर कहानी इतनी आसान नहीं होती। एक दिन आयरा ने अचानक कहा, “आर्यन, मुझे तुमसे कुछ कहना है।”
उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी गंभीरता थी।
“क्या हुआ?” आर्यन ने पूछा।
“मैं . . . मैं कुछ दिनों में इस शहर से जा रही हूँ,” उसने धीरे से कहा।
आर्यन के लिए यह सुनना जैसे किसी झटके से कम नहीं था, “कहाँ?”
“विदेश . . . एक प्रोजेक्ट के लिए। शायद लंबे समय के लिए,” उसने जवाब दिया।
कुछ पल के लिए दोनों के बीच ख़ामोशी छा गई। वही ख़ामोशी, जो कभी उनके रिश्ते की शुरूआत थी, अब जैसे अंत का संकेत बन गई थी।
“और . . . हम?” आर्यन ने धीमे से पूछा।
आयरा ने उसकी तरफ़ देखा, उसकी आँखों में हल्की-सी नमी थी, “हम . . . यादों में रहेंगे।”
उस एक वाक्य ने सब कुछ कह दिया था।
आने वाले दिन दोनों के लिए भारी थे। वे मिलते, बातें करते, हँसते—मगर हर हँसी के पीछे एक दर्द छुपा होता। दोनों जानते थे कि यह साथ ज़्यादा दिन का नहीं है, और यही बात उन्हें और क़रीब ला रही थी।
आख़िरी दिन, जब आयरा जा रही थी, एयरपोर्ट पर आर्यन उसके सामने खड़ा था। बहुत कुछ कहना था, मगर शब्द जैसे साथ छोड़ चुके थे।
“ख़ुश रहना,” आयरा ने कहा।
“तुम भी,” आर्यन ने जवाब दिया।
आयरा मुड़ी और चली गई। आर्यन वहीं खड़ा रहा, उसे जाते हुए देखता हुआ, जब तक वह भीड़ में खो नहीं गई।
उस दिन के बाद मेट्रो स्टेशन फिर वही था—भीड़ वही, आवाज़ें वही—मगर कुछ बदल गया था। अब वहाँ सुनहरी बालों वाली लड़की नहीं थी, और न ही वह हलचल, जो उसके दिल में हर दिन उठती थी। मगर कुछ कहानियाँ ख़त्म होकर भी ख़त्म नहीं होतीं। वे यादों में, एहसासों में, और दिल के किसी कोने में हमेशा ज़िंदा रहती हैं। आर्यन के लिए आयरा भी ऐसी ही एक कहानी बन गई थी—एक अधूरी, मगर ख़ूबसूरत कहानी, जिसने उसके दिल में हलचल तो मचाई, मगर उसे कभी पूरी नहीं होने दिया। और शायद यही उसकी सबसे बड़ी ख़ूबसूरती थी।
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