श्रीकृष्ण का उपचय
विवेक कुमार ‘विवेक’दुर्योधन तू अहंकारी है
तुझ पर काल अब भारी है
तो ले मैं अब सभा को छोड़ चला
तुझसे मैं मुख मोड़ चला
मैं अब तुझे ललकार रहा
काल तुझे पुकार रहा
जीवन का मैं दाता हूँ
अंतिम संकल्प सुनाता हूँ
ना सत्ता सुख से होता है,
ना सम्मानों से होता है,
जीवन का सार सफल केवल
बस बलिदानों से होता है।
जो तूने ये भर्म अपने मन भरमाया है
देख काल तुझे बुलाने आया है
तो ले अब रण मेंं जाता हूँ
अर्जुन को गीता ज्ञान सिखाता हूँ
सुन बात केशव की अर्जुन का चेहरा उतर गया,
अर्जुन यह सुनकर केशव के पैरों से लिपट गया
अर्जुन बोला सुनो कान्हा जितने ये सम्मुख खड़े हुए,
हम सब भाई उन्हीं के गोदों में पले बड़े हुए
ये जितने रण में खड़े हुए सब पूजने लायक़ हैं
माना दुर्योधन दुःशासन थोड़े से नालायक़ है
मैं अपराध दुःशासन करता हूँ, बेशक हम ही छोटे हैं,
ये जैसे भी हैं आख़िर माधव, सब चाचा के बेटे हैं॥
छोटे से भू-भाग की ख़ातिर हिंसक नहीं बनूँगा मैं,
अर्जुन यह सब कहकर मुख माधव से मोड़ दिया
हे केशव! ये रक्त स्वयं का पीना नहीं सरल होगा,
और विजय यदि हुए हम जीना नहीं सरल होगा।
केशव मुझको मृत्यु दे दो उससे पूर्व मरूँगा मैं।
हृदय सीझा गया अर्जुन का
जब गीता का ज्ञान शुरू हुआ
फिर अर्जुन ने बोला हे केशव तुम कौन हो
मुझे क्या बतलाने आये हो
यह सुनकर सारे सृष्टि के भगवन
बेहद ग़ुस्से में लाल दिखे
यह सुनकर सहमा-सहमा सा था
अर्जुन एक-दम रथ से खड़ा हुआ था।
माँ गीता के ज्ञान से सीधे हृदय पर प्रहार हुआ,
अर्जुन दम खम होकर युद्ध के लिए तैयार हुआ
चरणों में रखा शीश अर्जुन ने, केशव को प्रणाम किया।
सत्य का झंडा अर्जुन ने रण मेंं गाड़ दिया॥
5 टिप्पणियाँ
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सर्वश्रेष्ठ अतिसुंदर काव्य
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खुशियाँ देने वाली कविता
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महंताम् काव्य संग्रह
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अति सर्वत्र माधुर्य कविता
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अति सुंदर कविता