पिता का तकिया

01-09-2026

पिता का तकिया

कृति आरके जैन (अंक: 301, सितम्बर प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

मेरी कॉलोनी में रहने वाले एक वृद्ध की दिनचर्या वर्षों से नहीं बदली थी। हर शाम वह चारपाई पर बैठकर दरवाज़े की ओर टकटकी लगाए रहते। लोग समझते, शायद बेटे का इंतज़ार है। बेटा महीने में केवल एक बार आता। जल्दबाज़ी में हालचाल पूछता, दवाइयाँ रखता और कहता—“पिताजी, किसी चीज़ की ज़रूरत हो तो बता दिया कीजिए।” वृद्ध मुस्कुरा देते—“सब है बेटा . . . कुछ नहीं चाहिए।”

एक सर्द रात वह चुपचाप इस दुनिया से विदा हो गए। घर समेटते समय बेटे ने उनका पुराना तकिया उठाया। तकिया भारी लगा। खोलकर देखा तो उसमें न पैसे थे, न गहने; केवल सँभालकर रखी छोटी-छोटी पर्चियाँ थीं। हर पर्ची पर एक तारीख़ और अधूरी-सी टीस लिखी थी—“आज बहुत मन था कि बेटा थोड़ी देर बैठ जाता।”, “आज पहली बार खाना अकेले खाया।”, “डॉक्टर ने कहा, बातें करते रहिए . . . मगर किससे?”, “आज बरामदे में दो कप चाय रखी . . . दूसरी ठंडी हो गई।” सबसे आख़िरी पर्ची पर लिखा था—“अब उसे बुलाना मत . . . वह बहुत व्यस्त होगा।”

पर्चियाँ पढ़ते-पढ़ते बेटे की आँखें धुँधला गईं। उसे पहली बार समझ आया कि उसने पिता की हर ज़रूरत पूरी की, पर उनके अकेलेपन को कभी नहीं पढ़ा। उसने तकिए को सीने से लगा लिया। उस दिन वह पहली बार फूट-फूटकर रोया, क्योंकि दुनिया का सबसे महँगा तकिया वही होता है, जिसमें रूई नहीं, अधूरी प्रतीक्षाएँ भरी हों। रिश्ते अभाव से नहीं, उपेक्षा और प्रतीक्षा से दम तोड़ते हैं।

1 टिप्पणियाँ

  • 22 Sep, 2026 09:31 AM

    बहुत ही मार्मिक भावपूर्ण रचना है पिता का तकिया सच में बड़े बुजर्गो को बच्चों का साथ चाहिए और थोड़ा सा समय। बाकी उनकी इच्छाएं खत्म हो जाती हैं। समय रहते अपने मां बाप को समय दे उनसे बात करे बाद में पछताने से कोई लाभ नहीं

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