मुस्कान का उत्तर
कृति आरके जैन
सम्मान समारोह में जब मंच से उसका नाम पुकारा गया, तो उसने तालियों की ओर नहीं, आख़िरी पंक्ति में बैठी अपनी माँ की ओर देखा . . . और दोनों हाथों से अँगूठा उठा दिया। माँ की आँखें भर आईं। उन्हें वह दिन याद आ गया, जब यही बेटा बारहवीं में असफल होकर कमरे में बंद हो गया था। तीन दिन तक उसने किसी से बात नहीं की। चौथे दिन माँ ने दरवाज़े के नीचे एक पर्ची सरका दी। उस पर सिर्फ़ दो शब्द लिखे थे—“फिर कोशिश?” नीचे दो छोटे-से अँगूठे बने थे। उस दिन बेटे ने कोई उत्तर नहीं दिया। बस वह पर्ची अपनी किताब में रख ली। सालों की मेहनत के बाद आज वही लड़का मंच पर खड़ा था। पुरस्कार लेने से पहले उसने जेब से वही पुरानी, पीली पड़ चुकी पर्ची निकाली। उसे देखा, फिर माँ की ओर मुस्कुराकर दोनों अँगूठे उठा दिए। माँ समझ गईं—आज बेटे ने शब्दों से नहीं, उसी निशानी से उत्तर दिया था—
“हाँ माँ . . . उस दिन आपने मुझे हार से नहीं, ख़ुद से मिलने का दूसरा अवसर दिया था।” कई बार जीवन बदलने के लिए लंबे भाषण नहीं . . . किसी अपने का उठाया हुआ एक अँगूठा ही काफ़ी होता है।