मेरे आँगन में

15-07-2025

मेरे आँगन में

प्रतिभा पाण्डेय ‘प्रति’ (अंक: 281, जुलाई द्वितीय, 2025 में प्रकाशित)

 

घटायें साज़िश कर रहीं मेरे आँगन में, 
बारिश रह-रह बरस रही मेरे आँगन में। 
बिजली की चमक तन-मन थरथराहट, 
बड़ी सुन्दरतम बूँदे गिर रहीं मेरे आँगन में। 
 
सावन मनभावन आ गया है रे साजन, 
झूमने लगा अब तो मेरा अनमना मन। 
हरी-हरी चूड़ियाँ कलाई को सजातीं, 
हृदय का शृंगार लौट आया मेरे आँगन में। 
 
मयंक छूकर मदहोश कर रही मुझको, 
नज़र इंतज़ार करके बुला रही तुझको। 
हरियाली अंदर बाहर छा गई चारों ओर, 
पतझर सा झरे कनेर, गोकर्णी मेरे आँगन में। 
 
तरसे देखने को छवि कुनाल समझे कौन, 
तन-तड़प मन जाने, मन-तड़प जाने कौन? 
मधुर स्मृतियाँ, मृदुल अनुभूति प्राकाम्य, 
उत्संग तरंग उन्मुख मिलन रुचि मेरे आँगन में। 
 
आदर्श दुनिया क्या जाने प्रेमिल मिलन, 
पुराना होता जा रहा हमारा प्रेम गगन। 
रात भर जगे जगाये याद हिलोरें खाकर, 
प्रेम का जतन करना सजन मेरे आँगन में॥

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