मैं तुम्हें याद आऊँगी
ऋषिका कुमारी
प्रिय, मैं तुम्हें तब याद आऊँगी
जब तुम्हारे पास सब होगा
ईश्वर तुम्हें बड़े मकान दें,
पर तुम्हें वह छोटा-सा घर याद आएगा
जो मैं तुम्हारे साथ बसाना चाहती थी।
प्रिय, बेशक तुम्हारे पास बहुत-सी स्त्रियाँ होंगी
जिन्हें तुम्हें गहनों और कपड़ों से सजाओगी,
पर तुम्हें वह कन्या याद आएगी
जिसने प्रेम में तुम्हारे दिए गुलाब को भी
वर्षों तक पन्नों में सँजो कर रखा था
प्रिय, मैं तुम्हें वह हँसते पलों में याद आऊँगी,
जब अपने बड़े नेत्रों में अश्रु भरकर कोई
दुनिया की शिकायत तुमसे कोई नहीं करेगा।
“सुनो कब आ रहे हो, जल्दी आना“
“क्या तुम्हें मेरी याद नहीं आती?”
ऐसे सवाल जब कोई नहीं दोहराएगा
महीनों तक जब कोई तुम्हारी राह नहीं ताकेगा
मैं तुम्हें तब याद आऊँगी।
डर कर, घबराकर, कोमल फूल-सा बनकर
जब तुम्हारे बाँहों में कोई पनाह नहीं माँगेगा
मैं तुम्हें उन तन्हा रातों में याद आऊँगी।
प्रिय, मैं तुम्हें तब याद आऊँगी
जब तुम्हारे पास सब कुछ होगा।
1 टिप्पणियाँ
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3 Apr, 2026 11:00 AM
जो भावनाएँ मैं शब्दों में नहीं ढाल पाती, आपकी कविता उन्हें बिल्कुल वैसा ही बयान कर देती है