घाट किनारे: एक इंतज़ार

01-01-2026

घाट किनारे: एक इंतज़ार

ऋषिका कुमारी (अंक: 291, जनवरी प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

गंगा किनारे जब मुझे ले जाया जाएगा, 
शव को मेरे कुछ ऐसे लिटाया जाएगा। 
अपने मेरे लकड़ियाँ जोड़ रहे होंगे, 
पराये मौत का कारण पूछ रहे होंगे, 
सब उस रात मुझे जलता हुआ देख रहे होंगे। 
 
देखेंगे कैसे शरीर से राख बनती है, 
कैसे कोई बेटी, कोई सखी, कोई प्रेमिका . . . 
कैसे कोई मनुष्य से आत्मा बनती है। 
आग ठंडी भी न हो, सब छोड़ जाएँगे, 
ओस की बूँदों में सिकुड़ता मुझे अकेला कर जाएँगे। 
 
रोते हुए मेरे अपने फिर मुस्कुराएँगे, 
एक दूसरे का सहारा वो बन जाएँगे। 
धीरे-धीरे मेरी बातें कम हो जाएँगी, 
‘भूत-प्रेत को आवाज़ लगाते नहीं’—
कुछ ऐसे मेरी कहानियाँ कही जाएँगी। 
 
साल बीत जाएँ, सब भूल जाएँगे, 
उस घाट किनारे जब मेरे निशान मिट जाएँगे। 
तब मुझे ढूँढ़ते तुम आओगे क्या? 
ज़मीन खोद मुझे साथ अपने ले जाओगे क्या? 
 
सुंदर थी जो, चुलबुली सी वो, 
“वो लड़की यहीं कहीं है”—
कुछ ऐसे मेरा वर्णन करोगे क्या? 
एक आत्मा नहीं, अपना साथी . . . 
मुझे समझोगे क्या? 
उस घाट किनारे . . . 
मुझे ढूँढ़ते तुम आओगे क्या? 

1 टिप्पणियाँ

  • 1 Jan, 2026 09:07 PM

    संतुलित, मार्मिक तथा असहनीय। बेहद खूबसूरती से पंक्तियों को पिरोया है आपने। मेरी भी कुछ कविताएं साहित्य कुंज पर पब्लिश हुई है। बताइएगा आपको कैसी लगी।

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