किताब की मानिंद
पूजा अग्निहोत्री
मैं खुल जाना चाहती हूँ तुम्हारे सामने
एक किताब के मानिंद,
पर डरती हूँ कि तुम, पढ़कर मेरे हर हर्फ़ को,
दुनिया के सामने इज़हार न कर दो।
कराना चाहती हूँ रूबरू, ज़ख़्म-ए-नशेमन से,
जो मिले हैं, अपने ही हमदर्दों से।
पर डरती हूँ, तुम छू कर मेरे मर्म को,
दामन मिरा दाग़दार न कर दो।
ये भी सच है, मुझे प्यार नहीं तुमसे,
पर समाना चाहती हूँ, तुम्हें अपने वुजूद में।
डरती हूँ, होके बावस्ता मेरे जिस्म से,
रूह को तुम बेक़रार न कर दो।
दे न पाऊँगी एक बूँद इश्क़ भी, हसरत है मगर,
झीनी चूनर में चाहत के सितारे सजाने की,
डरती हूँ, जानकर मेरी कमज़र्फ़ ख़्वाहिशें,
कहीं तुम मुझे दरकिनार न कर दो।