ख़ुशी
पूर्णिमा मित्रा
जनवरी की बीस तारीख़। शाम के साढ़े छह बजे कड़ाके की ठंड। शंकुतला अपने फटे मोज़े पहन रही थी कि अचानक उसके कानों में आवाज़ आयी, “मोज़े ले लो। मोज़े ले लो।”
शकुंतला फ़ुर्ती से उठी। गेट के बाहर खड़ी होकर बोली, “सूती मोज़े नहीं है क्या?”
“सूती तो नहीं है। आप यह ले लो। पचास के दो,” छोटे से ठेले में मुश्किल से पचास-साठ जोड़ी लेडीज़ और बच्चों के मोज़े लिये उस किशोर फेरीवाले को देखकर, अनायास ही उस का मन दया से भर आया।
“असल में मुझे सिंथेटिक मोज़ों से एलर्जी है। फिर छुट्टे रुपये होंगे भी या नहीं,” उसने मोज़ों की उलटते पुलटते हताशा से कहा।
जैसे ही वह अपने कमरे में पहुँची तो उसकी आत्मा कचोटने लगी कि तीन दिन से इस फेरीवाले का करुण स्वर तुझे बैचेन कर रहा है और इससे एक जोड़ी मोज़े ख़रीदने में इतना सोच-विचार। देख तो सही पर्स में इतने रुपए तो होंगे ही। उसने तुरंत सामने पड़ा पर्स टटोला। पचास व बीस का नोट और पाँच का सिक्का पड़ा था।
वह लपककर रुपये लेकर बाहर गयी और फेरीवाले को थमाते हुए बोली, “लो बेटा, एक जोड़ी मोज़े दे दो।”
यह सुनते ही मोज़ेवाला उसे क्रीम रंग का मोज़ा थमाते हुए बोला, “आज तीन दिन से बोहनी नहीं हुई आंटी। चलो आपने बोहनी तो करा दी।”
“बस बेटा, मैं तो तेरी कामयाबी के लिये भगवान से दुआ ही कर सकती हूँ। बस हौसला रख। हिम्मत न हार।”
उसके इतना ही कहते ही फेरी वाले के चेहरे और आवाज़ में ख़ुशी झलकने लगी।