कच्चा पक्का मकान था अपना
चाँद शुक्ला 'हदियाबादी'कच्चा पक्का मकान था अपना
फिर भी कुछ तो निशान था अपना
मैं था और साथ मेरी तन्हाई
सिर्फ़ माज़ी था दरमियान अपना
तुम भी थे साथ और ज़माना भी
एक कड़ा इम्तिहान था अपना
क्यों न उसको पुकारता या रब
सूना सूना जहान था अपना
"चाँद" था और ख़ला की वीरानी
एक फ़क़त आस्मान था अपना
0 टिप्पणियाँ
कृपया टिप्पणी दें
लेखक की अन्य कृतियाँ
- ग़ज़ल
-
- अम्बर धरती ऊपर नीचे आग बरसती तकता हूँ
- कच्चा पक्का मकान था अपना
- किस तरह ख़ाना ख़राबां फिर रहें हैं हम जनाब
- ख़ुशबुओं की तरह महकते गए
- छुप के आता है कोई ख़ाब चुराने मेरे
- जब पुराने रास्तों पर से कभी गुज़रे हैं हम
- तुझे दिल में बसाना चाहता हूँ
- धुँधली धुँधली किसकी है तहरीर है मेरी
- मेरे गीतों मेरी ग़ज़लों को रवानी दे दे
- साँप की मानिंद वोह डसती रही
- हम खिलौनों की ख़ातिर तरसते रहे
- विडियो
-
- ऑडियो
-