काश! मैं वृक्ष होता
डॉ. मुल्ला आदम अली
रंग बिरंगे पुष्प खिलाता
मन भावन ख़ुश्बू फैलाता।
बिन माँगे ही फल देता
कुछ ना अपने लिए बचाता।
परोपकार में होता दक्ष
काश! मैंं बन जाऊँ वृक्ष।
प्रेम सुधा बरसात सब पर
चाहें खग हो, चाहे चौपाया।
नव जीवन भर देती सब में
मेरी ठंडी, शीतल छाया।
करता न्याय होकर निष्पक्ष
काश! मैंं बन जाऊँ वृक्ष।