जनवरी की सुबह
डॉ. हिमाँशु कुकरेती
जनवरी की सुबह
धीरे-धीरे खुलती है
जैसे किसी पुराने पत्र का लिफ़ाफ़ा
जिसके शब्द धुँध में भीगे हों
यह समय का वह विराम
जहाँ प्रकृति अपने अस्तित्व पर ही
सवाल करती है।
कोहरा सिर्फ़ हवा में नहीं,
स्मृतियों में भी उतर आता है,
हर रास्ते को
अधूरे वाक्य में बदल देता है
यह कोई आवरण नहीं
यह तो प्रश्न है . . .
क्या स्पष्टता
वास्तव में आवश्यक है
हर सच के लिये?
सूरज तर्क करता है
प्रकाश के पक्ष में
वह आज साहस नहीं करता
पूरी तरह निकल आने का,
वह बस
एक फीकी-सी उपस्थिति है
जैसे दूर बैठा कोई परिचित
जो हालचाल पूछना भूल गया हो।
हाथ जेबों में सिमट जाते हैं,
और साँस
भाप बनकर
अपने होने का प्रमाण देती है
ठण्ड देह को नहीं
अहम को जमाती है
यह कठोर नहीं होती,
यह हमें सिकोड़ती नहीं,
हमें भीतर की ओर मोड़ती है
जहाँ
सबसे ज़्यादा शोर के बाद
सबसे गहरी शान्ति है।