गंगा में तैरते मिट्टी के दीये: एक अवलोकन

01-07-2026

गंगा में तैरते मिट्टी के दीये: एक अवलोकन

डॉ. राशि सिन्हा (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

समीक्षित पुस्तक: पुस्तक: गंगा में तैरते मिट्टी के दीये
काव्य संग्रह हाइकु, ताँका, सेदोका संकलन
लेखक: डॉ. रमा द्विवेदी
प्रकाशक: शब्दांकुर प्रकाशन
पृष्ठ संख्या: १३८
मूल्य ₹300 
उपलब्धता: गंगा में तैरते मिट्टी के दीये (amazon.in)

 

साहित्य की उत्स भूमि में संवेदना की नीर‌ ने उसकी हर विधा को उर्वर रखा है, और कवित्व-चेतना की बूँदों ने तो उसमें एक अलग ही ध्वन्यात्मकता भरने का काम किया है—फिर चाहे तुकांत हो या अतुकांत, नवीन धारा की काव्य लहरियाँ हों या प्राचीन धारा से साहित्य को सींचती काव्य पंक्तियाँ। सभी ने अपनी बदलती और स्थिर प्रकृतियों-प्रवृत्तियों के साथ काव्य संवेदना में नये सौंदर्य ही भरे हैं। इस संदर्भ में इन दिनों, बदलते परिदृश्य की अस्थिरता पर गहन चिंतन में प्रकृति, आध्यात्म, दर्शन, कला, कल्पना के साथ तादात्म्य स्थापित कर, पारंपरिक संरचना वाली तुक विहीन छंदों में तुकांतता का सा भाव लिए, जापानी विधा की हाइकु काव्य विधा ने अपनी संक्षिप्त सांकेतिकता में निहित चित्र-व्यंजित युग बोध के कारण लेखकों की सृजनात्मकता को आकर्षित कर, साहित्य में अपनी ख़ूब पैठ बनाई है। इसके साथ ही ताँका-सेदोका जैसी विधाएँ भी लेखकीय चेतना में प्रवाहित हो पुस्तकों के माध्यम से ख़ूब-ख़ूब विस्तार पा रहे हैं—डॉ. रमा द्विवेदी जी की सद्य: प्रकाशित कृति, ‘गंगा में तैरते मिट्टी के दीये’ इसी काव्य चेतना की विस्तृत कड़ी है।

शब्दांकुर प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित, ३०० रुपये मूल्य के पेपरबैक के प्रथम संस्करण के इस हाइकु-तॉंका-सेदोका संग्रह में कुल १३७ पृष्ठ हैं। १३७ पृष्ठों के इस संग्रह में लेखिका ने इन तीनों विधाओं चार खण्डों में विभाजित कर, प्रकृति की दार्शनिक प्रतिपत्ति के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक मूल में अपनी काव्य चेतना का बहुत सुंदर-सार्थक विस्तार दिया है।

शीर्षक में आध्यात्मिक सांस्कृतिक सामाजिक अंतर्सम्बन्धों के मूल में गंगा के प्रति स्थापित आस्था की चेतना को दर्शाता यह संग्रह साहित्य के सनातन भाव की अनंतता का रूपकात्मक भाव प्रतीत होता है।

सत्य है, साहित्य की सनातन परंपरा में पुण्य सलिला गंगा सदा से कवियों की वाणी की धारा में प्रवाहित होती रही है। संदर्भ गत, श्रीमद्‌ भगवद्गीता के अध्याय १० के श्लोक ३१ में भगवान श्री कृष्ण की वाणी में गंगा की ओर से, गंगा के लिए उच्चरित श्लोक के भावों की तादात्मयता बड़ी सार्थक प्रतीत होती है जहाँ गंगा के संदर्भ में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं, “स्रोतसामस्मि जाह्नवी” अर्थात्‌ बहने वाली नदियों में मैं गंगा हूँ। यह स्वीकारोक्ति महज़ लौकिक और आध्यात्मिक पक्षों के समेकन की वैयक्तिक चेतना भर नहींं, बल्कि सनातन के अर्थों में अंतर्निहित शाश्वतता या स्थायी भावों की वो स्वीकृति है जो सदा से सदा के लिए सृष्टि की काव्यात्मक एवं रागात्मक, छंदमुक्त व छंदबद्ध लयों और वाक्यों में अपनी प्रकृति गत संवेदनाएँ भरती आई है। सत्य है, पुण्य सलिला माँ गंगा की संवेदनाएँ ही तो हैं जो साधारण जीवन संगम में आस्था के दीप प्रज्ज्वलित कर, मानवीय प्रवाह भावों के साथ प्रवाहित हो अर्पित होते रहने की प्रकृति गत सात्विक भावों की रागात्मकता की ओर हमें उन्मुख करती है। हमारे भीतर के प्रवाह में आस्था और संयम की काव्य धारा का आदि और नवीन संवेदनाओं की साहित्यिक चेतना भर, प्रकृति की दार्शनिक प्रतिपत्ति के मूल में अनंत रूपात्मकता से शब्दों और भावों के चित्र व्यंजना में उतरती चली जाती है। डॉ. रमा जी की चित्र-व्यंजित अभिव्यक्ति की बात करते ही प्रथम हाइकु जो मन को स्पर्श कर, हृदय पटल पर उतरती है वह प्रथम खण्ड—प्रकृति-पर्यावरण—बसंत बहार में उल्लेखित पंक्तियाँ हैं:

“मिट्टी के दीये / गंगा में हैं तैरते / प्रकाश भरें।”

शीर्षक से तादात्म्य स्थापित कर, कवित्व-चेतना में आस्था को प्रवाहित करती ये गहरे बिम्ब की पंक्तियों के अतिरिक्त आगे भी कवयित्री ने अपने तीन पंक्तियों के‌ शब्दांशों से गंगा की स्थायी-सांस्कृतिक चेतना को उल्लेखित किया है। पंक्तियों के माध्यम से वह कहती हैं:

 “तैरते दीये / संदेश देते चले / स्मृतियाॅं पलें“

 “तैरते दीये / अनंत की यात्रा में / उजास भरें।”

“तैरते दीये / अर्पण व तर्पण / समर्पण भी।”

 “गंगा जल में / अस्थियाँ विसर्जित / मोक्ष विश्वास।”

 “अनंत यात्रा / पंच तत्त्व विलीन / काया विहीन।”
 
“मोक्षदायिनी / पापनाशिनी गंगा / भव-तारिणी।”

मानवीय चेतना में आस्था के सूक्ष्म धर्म में आध्यात्म को प्रवाहित कर आचमन से, दान और दान से मोक्ष तक की यात्रा करती ये पंक्तियॉं कवयित्री के कवित्व भावों में निहित सादगी से सहजता और सहजता से सिद्धता की महज़ अभिव्यक्ति भर‌ नहीं, बल्कि कला एवं कल्पना में प्रकृति के उस समन्वयन का चिंतन और दर्शन है जो आज युगीन संवेदना से लुप्तप्राय होने को है।

मानव एवं प्रकृति के इस समन्वयन में कवयित्री ने अपने इस संग्रह के आगे के अन्य खण्डों में युगीन संवेदनाओं में व्याप्त अनगिनत विविध ह्रास के परिदृश्यों को भी शब्द और भावों से व्यंजित किया है। इस संदर्भ में कुछ पंक्तियों का उल्लेख आवश्यक है:

खण्ड २:

“धरती हूँ मैं / सहिष्णुता है धर्म।  / स्नेह बॉंटती”

“पूछती धरा / कैसे रहूँ जीवित / दूषित हवा”

“बूढ़ी आँखों से / घन-घन बरसे / पूत न आवै”

“सुलगती-सी / पड़ी है ऐश-ट्रे में / औरत है‌ वो”

ताँका खण्ड ३:

 “सात फेरे भी / रिश्ते बचा न पाऍं / व्यर्थ वचन- / प्रणय अनुबंध / झूठे सब सम्बन्ध”

“खो गया सब / सभ्यता की दौड़ में / सुख-सुकून / दौड़ रहे फिर भी / चौंधियाई आँखों से।”

सेदोका खण्ड ४:

“रौंद ही डाली / भारतीय संस्कृति / पाश्चात्य सभ्यता ने / कैसै बचेगी / स्नेहिल सद्भावना / भ्रमित युवा पीढ़ी।”
 
“क्या है तुम्हारा / पाया सब यहीं पे /  खोना भी सब यहीं / सोच समझ / कर्म साथ जाएगा / सब छूट जाएगा।”

युग बोध के विविध स्वरों को अपनी संवेदनाओं में पिरोती उपर्युक्त सभी पंक्तियों में, कवयित्री सामाजिक यथार्थ, सामाजिक विडंबनाओं, आज की युवा पीढ़ी के शुष्क आचरण-संत्रास, स्त्री के विखड़ित होते स्व, मातृत्व के बिखरे टूटे स्पंदित हृदय जैसे कई-कई‌ विविध आयामों को समकालीन परिदृश्यों में चित्र व्यंजित किया है। परिदृश्यों की व्यंजना में आंदोलित होती अपनी भावनाओं को बड़ी आत्म सजगता के साथ भावों और शब्दों की अभिव्यक्ति प्रदान की है।

संवेदना के विविध आयामों को स्वर देने में कवयित्री ने जापानी विधा की समस्त बारीक़ियों को बड़ी सहजता और सरलता से संतुलन में रखा है। विषय वस्तु के चयन से लेकर उसके विविध पक्षों के मूल्यांकन में, कवयित्री ने न सिर्फ़ दृश्य जगत के सौंदर्य बोध को सँभाले रखा है, बल्कि क्षणभंगुर पलों में इंद्रियों से जुड़ ये कथ्य अपने बिंब प्रयोजन में सफल हो सकें इसका भी पूरा ख़्याल रखा है।

१७ अक्षरों की पारंपरिक संरचना वाले ५-७-५ के सारगर्भित शब्दांशों के काव्य प्रसार हों या फिर खण्ड तीन में उल्लेखित तॉंका की वैज्ञानिक तकनीकी बारीक़ियाॅं हों या फिर खण्ड-4 में अभिव्यक्त सेदोका—तीनों ही विधा की कविताओं में तकनीकी और भाषा के वैज्ञानिक अर्थों की सटीकता के साथ-साथ कवयित्री ने आवश्यकतानुसार, ५+७+५+७+७ अर्थात्‌ ३१ अक्षरों या वर्णों के काव्य सृजनों में संवेदनाओं का बहुत बारीक़ संतुलन बनाए रखा है और यह बात इस संग्रह को वैज्ञानिक और संवेदनात्मक स्तर से पूर्ण बनाती है।

इन संतुलनों के साथ-साथ कवयित्री का भाषाई प्रवाह भी संग्रह की पंक्तियों को अत्यंत गहरे भावों से जोड़, बड़ी आसानी से पाठकों के हृदय में गहरे उतर जाने का सामर्थ्य रखता है।

गंगा जल की प्रवाहित काव्य चेतना में सरल भाषाई प्रवाह को हृदय की अंजुरी में भर आचमन करता-करवाता यह संग्रह निश्चित रूप से विविध आयामों से आबद्ध संवेदनात्मक संयोजन है।

अपने आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक समन्वयन के आधार पर पाठकों की पाठकीय चेतना से तादात्म्य स्थापित कर, यह संग्रह, कवयित्री के काव्य लक्ष्यों की पूर्णता पा सके। इन्हीं शुभकामनाओं के साथ आशा करती हूँ कि आगे भी कवयित्री की लेखनी से ऐसे सृजनात्मक अभिव्यक्ति हम पाठकों तक पहुॅंचती रहेगी। हार्दिक शुभकामनाएँ। 

डॉ. राशि सिन्हा
नवादा, बिहार

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें