दुख

वैद्यनाथ उपाध्याय (अंक: 213, सितम्बर द्वितीय, 2022 में प्रकाशित)

पिछले कुछ दिनों से मन अशांत रहने लगा था। उसे संसार सब कुछ बेमेल जैसा लगने लगा। सोच समझकर कुछ करने को ठानता था। लेकिन देखता है उसके सोचे जैसा कुछ भी नहीं हो रहा है। यह देखकर उसका मन भड़क उठता था। मन में कई तरह के सवाल थे लेकिन समाधान उसके मन के पहुँच से बाहर था। मन में तरह तरह के विचार कौंधते रहते हैं। क्या करें, क्या नहीं करें कुछ सूझता नहीं था। 

उसको लगता है ज़िन्दगी एक कहानी ही है। लोग तरह-तरह के दुख भोग रहे हैं। जानते हुए भी आदमी अपने मन को वश में नहीं रख सकता तब उसे वह नियति मानने लगता है। अपने आस-पड़ोस की घटनाओं पर विचार करता है। अपने साथियों के जीवन की घटनाओं को याद करता है। देखता है चले तो थे सब सुख पाने के लिए लेकिन दुख के सिवाय उन्हें कुछ नहीं मिला। 

संसार उपयोगितावाद पर चलता है। जो दूसरों के काम आ सकता है उसे ही लोग पसंद करते हैं। काम आने तक उसका भरपूर उपयोग कर उसे छोड़ देते हैं। दिन भर सूरज धरती को तपिश और प्रकाश बिखेरता है। लेकिन शाम होते ही डूबते सूरज को देखकर लोग अपने दरवाज़े बंद कर देते हैं। संसार में स्वार्थ की कोई सीमा नहीं है। जब तक अपना स्वार्थ रहता है तब तक ही लोग किसी चीज़ को तवज्जोह देते हैं। 

किशोर एक बहुत ही अच्छा मिज़ाज का आदमी था। विद्यालय में शिक्षक का काम करता था। अख़बारों में भी लिखता था। धनवान नहीं था, किसी तरह गुज़र-बसर करता था। न जाने किस लिए एक लड़की का दिल उस में लगा। गाँव के ही खाते-पीते परिवार की लड़की थी। गाँव में लड़की के माँ-बाप के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन सकता था। इसलिए शहर में जान-पहचान के साथियों के यहाँ भागकर रहने लगा। कुछ महीने बाद वह उस लड़की से शादी रचाकर गाँव लौटा। सब कुछ ठीक-ठाक ही था। अचानक एक रात को लड़की के घरवालों ने उस पर हमला बोल दिया। तेज़ धारदार हथियारों से उसके पीठ पर कई प्रहार किए। उसे बचाने गई लड़की का दायाँ हाथ कट गया। फिर भी उनका हमला रुका नहीं। उसको संकटजनक अवस्था में अस्पताल पहुँचा दिया गया। अस्पताल के बेड में उसकी स्थिति को देखने के लिए कई लोग आए गए। अख़बारों में घटना का प्रचार हुआ। लैला मजनूँ की तरह था दोनों प्रेमी युगल का हाल। 

अस्पताल में मौत से जूझ रहे किशोर को अब पता भी नहीं था कि वह बच गया तो फिर रहेगा कहाँ? उसके पास न धन था, न कोई जायदाद। जो कुछ था गाँव में ही था। जबकि अब वहाँ रहना सम्भव ही नहीं था, इसलिए आगे का जीवन जीने की मुसीबत भी थी। भाग्य के सभी द्वार बंद हो जाने पर भी कहीं से कोई द्वार तो खुल ही जाता है। कई साल पहले उसकी खोई हुई दीदी उसकी ख़बर अख़बार में छपी देखकर उसे ढूँढ़ते हुए अस्पताल पहुँच गई। इस दुर्घटना ने उसकी खोई हुई दीदी के साथ मिलन करा दिया। उसके लिए डूबते को तिनके का सहारा जैसा लगा। कई दिनों के उपचार के बाद वह कुछ स्वस्थ्य हुआ तो उसी दीदी ने अपने घर में पनाह दी। सब कुछ ठीक-ठाक होते हुए भी अचानक उस दिन आयी विपत्ति ने उसके जीवन को ही उलट-पलट कर दिया। अब उसे दूसरे की दया पर गुज़र-बसर करना पड़ रहा था। दीदी के यहाँ रहे भी तो कब तक . . .? 

एक दिन ‘दैनिक पूर्वोदय’ अख़बार में एक विज्ञापन पढ़ा। तिनसुकीया एवं शिलांग में स्टाफ़ रिपोर्टर चाहिए। उसने आवेदन किया। अख़बार के लोगों से जान-पहचान होने के कारण एवं उसकी दुखद स्थिति से ज्ञात होकर अख़बार ने उसके मर्ज़ी के अनुसार शिलांग में स्टाफ़ रिपोर्टर नियुक्त किया। कुछ दिन दीदी के घर से ही काम चलाता रहा। लेकिन बाद में शिलांग में कमरा लिया। वहीं कम्प्यूटर ख़रीदकर डीटीपी का काम भी करने लगा। साथ ही शहर के ग़रीब परिवार की लड़कियों को मुफ़्त में डीटीपी का काम सिखाता रहा। पत्रिका निकालने का सपना देखता था। शहर का परिवेश था। एक बेटा जन्मा। परिवार बहुत सुन्दर ढंग से चलने लगा। जब जीवन की गति समृद्धि की ओर होती है, तब सभी अपने हो जाते हैं। उस पर जानलेवा हमला कर गाँव से विस्थापित करनेवाले पत्नी के घरवाले भी अब उसके अपने होने लगे। उसकी समृद्धि ने सबको जोड़ लिया। लेकिन उसकी पत्नी का कटा हुआ हाथ उस घटना को बार-बार याद दिलाता रहा। पत्नी के घरवालों को अफ़सोस होता था अपने किए पर। अब पत्नी भी पोस्ट ऑफ़िस में सेविंग्स एकाउंट के काम में लग गई। उसकी समृद्धि व ख़ुशहाली पर लोगों को ईर्ष्या होने लगी थी। बड़े बेटे को अँग्रेज़ी स्कूल में दाख़िला करा दिया था। पत्नी दोबारा गर्भवती हुई। जुड़वाँ बेटे पैदा हुए। बच्चों को सम्हालने के लिए किसी औरत का सहारा लेना पड़ा। उसकी मदद के लिए हमने भी हाथ बटाया। सब ओर से ख़ुशहाल ज़िन्दगी। किशोर दिनभर बड़े-बड़े लोगों के पत्रकार सम्मेलनों में जाता था। रिपोर्टिंग करता था। पैसा और नाम दोनों कमा लिए उसने। शिलांग में ढेरों जान-पहचान बन गई थी। 

ज़िन्दगी की राहें बहुत ही विचित्र होती हैं। कब राहें चलते-चलते मौत की ओर बढ़ने लग जाती हैं, आदमी को पता ही नहीं चलता। समय ने करवट बदली। और कहानी फिर दूसरी ओर मुड़ गई। अचानक गले में आई ख़राश के चलते वह डॉक्टर को दिखाने गया। डॉक्टर ने टीबी एवं कैंसर की जाँच करवाई। बाद में पता चला टीबी और कैंसर दोनों हो गए हैं। उस पर फिर से मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ा। वह उपचार कराने भेल्लौर चला गया। वहाँ लम्बे उपचार के चलते अख़बार ने उसे निकाल दिया। एक तो बीमार का उपचार का ख़र्चा और दूसरी ओर बेरोज़गारी ने उसे फिर से सताया। उसे चाह कर अपने दायाँ हाथ कटवाने वाली उसकी चहेती पत्नी भी अब उससे दूरी बनाने लगी। उसके उपचार के क्रम में भेल्लौर के प्रवास के दौरान ही उसका किसी दूसरे फ़ौजी के साथ रंगरेलियाँ चलने लगीं। एक तो बीमार का बोझ था और वहीं पत्नी का स्वभाव भी उसके प्रति कर्कश होने लगा। कल तक प्यार-मुहब्बत जताने वाली पत्नी का आज व्यवहार बदल गया। कल तक उसकी नौकरी थी, पैसा कमाता था, सब कुछ ठीक ठाक ही था। अब उसका शरीर बीमार था, उसे नौकरी से निकाल दिया गया था इस असहाय की स्थिति में उसके प्रति सबका व्यवहार बदला-बदला सा लगने लगा। लोगों का व्यवहार अब उसे, अस्तगामी सूरज को देखकर लोगों के दरवाज़े बंद करने जैसा लगता है। किशोर को लगा प्यार-व्यार, सगे-सम्बन्धी सब कुछ स्वार्थ के लिए हैं। जब अपने स्वार्थ में कुछ आँच आने लगती है तब लोग मुँह मोड़ने लग जाते हैं। यह उसने कहीं पढ़ा हो, ऐसा नहीं है, उसके भोगे हुए जीवन की यथार्थ है। वह इसी स्वार्थपरता की कहानी का पात्र था। 

बीमार से वह अशक्त होता चला गया। अब वह बेरोज़गार भी था। उसका आय भी बन्द हो गई। बच्चे को अँग्रेज़ी स्कूल से निकाल कर सरकारी विद्यालय में दाख़िल करवा दिया। किराए का मकान भी छोड़ना पड़ा। फिर से वह अपनी दीदी की शरण में चला गया। कहते हैं मुसीबत भी जब आती है तब अपने सगे-सम्बन्धी सबको लेकर आती है। बीमार, अशक्त पति और तीन बच्चों को छोड़कर पत्नी किसी दूसरे के साथ भाग गई। 

अब किशोर को उसके तीन बेटों का भविष्य की चिंता होने लगी। उसे तो आज या कल इस दुनिया से चला जाना है। लेकिन छोटे बच्चों का क्या किया जाए? अपनी बीमारी का ख़्याल किए बग़ैर बच्चों को लेकर वह दार्जिलिंग चला गया। माँ-बाप के होते हुए बच्चों को किसी अनाथ आश्रम के हवाले कर दिया। जीवन है तो दुख तो होगा ही। लेकिन इस तरह का दुख भी कभी भुगतना पड़ सकता है, उसने कभी सोचा नहीं था। प्यार मुहब्बत का नाटक करने वाली पत्नी उसे बदहाल अवस्था में छोड़कर चली गई। उसके प्यार की निशानी तीन बेटों को अनाथ आश्रम में छोड़ आया। मन के दुखी होने पर संसार सब कुछ फीका-फीका सा लगने लगा। किसी चीज़ में मन नहीं लगता। कुछ खाने को मन नहीं करता। संसार में सब कुछ दुख ही दुख दिखता उसे। बच्चों को अनाथ आश्रम में छोड़कर रेल में सवार होकर गुवाहाटी के लिए रवाना हो गया। रेल का सफ़र बहुत बार किया था उसने। उस बेवफ़ा पत्नी को लेकर भी बहुत बार यात्रा की थी। लेकिन यह सफ़र उसे बहुत अजीव सा लग रहा था। न कहीं जाकर रहने का स्थान था, न ही अपना कहने को अब कोई बचा था। अपना होने वाले, कहने वाले सभी का व्यवहार देख लिया था उसने। इस यात्रा में उसका मन भी साथ नहीं दे रहा था। मन बार-बार बच्चों के पास ही लौट-लौट कर चला जाता था। कोई जाने-पहचाने लोग मिल भी जाते थे तो फिर वही सवाल? वही खुरचन? दुख भोगने के लिए वह ज़्यादा दिन तक जीवित नहीं रहा। वह चल बसा। लेकिन पीछे छोड़ गया दुख और विद्रूपता से भरी कहानी। इतने कम समय में ही उसने जीवन की यथार्थ को कहानी की तरह जी लिया। यह किशोर की भोगी हुई कहानी है। उसकी समृद्धि के दौरान उसका साथ देने वाले सभी साथी संगी पराए की तरह बर्ताव करने लगे थे। 

इस सच्ची घटना को कहानी में पुनर्जीवित करते हुए उसका दिल भारी होने लगा। वह सोचता कहानी काल्पनिक कहाँ है? हज़ारों लाखों लोगों की भोगी हुई नियति है। कहते हैं कि जो कुछ जिस रूप में होना होता है, वह पहले से ही तय रहता है। क्या इस घटना की स्क्रिप्ट भी पहले से ही तय थी? ऐसे कई सवाल हैं जो लेखक को बेचैन करते रहते हैं। इन घटनाओं को याद कर वह विह्वल हो जाता है। कहानी आगे जारी रहती है। अब किशोर के जीवित रहते अनाथ आश्रम को सौंपे वे तीन बच्चों का हाल क्या है? उसकी भागी हुई पत्नी अब किसके साथ किस हाल में है? कहानी जीवन के साथ साथ चलती रहती है। लेकिन कहानीकार का पहुँच वहाँ तक नहीं है। इसलिए आगे की घटना पर कहानीकार बेज़ुबान है। 

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें