डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री: ग़ज़लधर्मिता और आलोचना-कर्म

01-07-2026

डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री: ग़ज़लधर्मिता और आलोचना-कर्म

अविनाश भारती (अंक: 300, जुलाई प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

हिन्दी ग़ज़ल ने पिछले कुछ दशकों में जिस तेज़ी से अपनी ज़मीन मज़बूत की है, वह अकल्पनीय है। निःसंदेह इसमें ग़ज़ल के कई प्रतिबद्ध नाम शामिल हैं, जिन्होंने इसे जनमानस तक पहुँचाने का अथक प्रयास किया है। उन्हीं नामों में एक डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री भी हैं, जिन्होंने न सिर्फ़ ग़ज़लें कही हैं, बल्कि आलोचना और शोध के स्तर पर भी ग़ज़ल को नई दृष्टि दी है। उनकी पहचान एक प्रतिबद्ध ग़ज़लकार और निष्पक्ष आलोचक के रूप में ख्यात है।

10 जनवरी 1978 को भवानंदपुर (बेगूसराय, बिहार) में जन्मे डॉ. जाफ़री ने हिन्दी, अंग्रेज़ी, शिक्षाशास्त्र और पत्रकारिता की उच्च शिक्षा प्राप्त की तथा ग़ज़ल विषय पर अपनी पीएच.डी. पूरी करने के साथ-साथ यूजीसी-नेट की परीक्षा भी उत्तीर्ण की। उनकी प्रकाशित कृतियों में ‘खुले दरीचे की ख़ुशबू’ और ‘ख़ुशबू छूकर आई है’ जैसे ग़ज़ल-संग्रह हैं तो ‘परवीन शाकिर की शायरी’, ‘हिन्दी ग़ज़ल : स्वभाव और समीक्षा’, ‘ग़ज़ल-लेखन परंपरा और हिन्दी ग़ज़ल का विकास’, ‘डॉ. भावना का ग़ज़ल साहित्य : एक मूल्यांकन’, ‘हिन्दी ग़ज़ल : विचार और विस्तार’, ‘हिन्दी ग़ज़ल : महत्व और मूल्यांकन’ जैसी कई आलोचना-ग्रंथ भी शामिल हैं। इसके अतिरिक्त उन्होंने बाल-साहित्य और संपादन के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया है। ‘आखिर चाँद चमकता क्यों है’, ‘चाँद हमारी मुट्ठी में है’, ‘चलें चाँद पर पिकनिक करने’ आदि उनकी बाल कविताओं के संग्रह हैं।

ज्ञात हो कि डॉ. जाफ़री की आलोचनात्मक दृष्टि ने हिन्दी ग़ज़ल को गंभीर अकादमिक आधार दिया है। उन्होंने परंपरा और प्रयोग, स्वभाव और समीक्षा के द्वंद्व में हिन्दी ग़ज़ल के स्वरूप को सुस्पष्ट किया है। डॉ. रोहिताश्व अस्थाना, कमलेश भट्ट ‘कमल’, अनिरुद्ध सिन्हा, शिवशंकर मिश्र, सुल्तान अहमद, ज्ञानप्रकाश विवेक, वशिष्ठ अनूप, हरेराम समीप और डॉ. भावना जैसे आलोचकों की परंपरा के बाद आलोचना-कर्म को जिस गंभीरता और ईमानदारी से डॉ. जाफ़री ने निभाया है, वह उन्हें समकालीन परिदृश्य में विशिष्ट स्थान देता है। दूसरी ओर उनकी ग़ज़लें भी किसी रोमानी छाया में नहीं डूबी हैं और न ही केवल मनोरंजन का माध्यम हैं। वे यथार्थ के दर्पण की तरह समाज और जीवन के हर पहलू को सामने रखती हैं। यही कारण है कि उनकी ग़ज़लधर्मिता हमें उस परंपरा की याद दिलाती है जिसमें ग़ज़ल केवल इश्क़ की दास्तान नहीं, बल्कि समय और समाज की ज़ुबान हुआ करती है।

उदाहरण के लिए उनका यह शेर देखें—

छोड़ कर बूढ़े शजर को घर अधूरे रह गए,
पर्वतों से जब कटे पत्थर अधूरे रह गए।

यह शेर न केवल घर की बुनियादी इकाई पर प्रकाश डालता है, बल्कि बुज़ुर्गों के महत्व को भी रेखांकित करता है। जब घर से बुज़ुर्ग का साया हट जाता है, तो घर केवल ईंट-पत्थरों का ढाँचा रह जाता है। यह शेर आधुनिक पारिवारिक विघटन का मार्मिक चित्र है।

इसी तरह वे कहते हैं—

यों तन्हा हर मुसीबत में अकेले झेल लेता हूँ,
मगर बीमार पड़ता हूँ तो घर भर याद आता है।

यह शेर रिश्तों की उस नमी को सामने लाता है, जो कठिन घड़ी में और गहरी हो जाती है। जीवन की आपाधापी में इंसान स्वयं को आत्मनिर्भर मान लेता है, लेकिन बीमार पड़ने पर उसे परिवार की अहमियत का एहसास होता है। डॉ. जाफ़री की यह दृष्टि उन्हें मानवीय रिश्तों का संवेदनशील शायर सिद्ध करती है।

उनकी ग़ज़लों में सामाजिक विकृतियों पर भी तीखी चोट मिलती है। देखें—

ये झाड़-फूँकने वाले भी काम नहीं होते,
दुआ तो देंगे मगर फिर दवा दिखाएँगे।

यह शेर अंधविश्वास और समाज में पनपी ठगी की प्रवृत्ति पर कटाक्ष है। ‘झाड़-फूँक’ केवल एक अंधविश्वासी व्यवहार नहीं, बल्कि उस मानसिकता का प्रतीक है, जो आसान समाधान की तलाश में अपनी विवेकशीलता खो बैठती है।

डॉ. जाफ़री के कई शेर व्यवस्था और राजनीति पर व्यंग्य भी करते हैं। उनका यह शेर—

वो ज़िंदगी में कहाँ मुश्किलें तलाशेंगे,
जो हम मरेंगे तो सब फ़ाइलें तलाशेंगे।

प्रशासनिक तंत्र की उदासीनता और नौकरशाही की काहिली पर गहरी चोट है। इस शेर में निहित कटाक्ष व्यवस्था की सच्चाई को उजागर करता है।

इसी प्रकार आधुनिक मूल्यों के क्षरण पर उनकी टिप्पणी देखें—

हमने तो अब बुज़ुर्ग की इज़्ज़त भी छोड़ दी, 
यानी कि इस सदी से भी आगे निकल गये। 

यह शेर आधुनिक जीवन में पारंपरिक मूल्यों और संस्कारों के ह्रास की ओर इशारा करता है। आधुनिकता के नाम पर जब इंसान अपने संस्कारों से दूर होता है, तो समाज की मूल आत्मा ही ख़तरे में पड़ जाती है। 

उनकी ग़ज़लों में जीवन-दर्शन भी झलकता है। उदाहरण के लिए—

मुस्तकिल है ना ठिकाना किसी बंदे की तरह, 
ज़िन्दगी हमने गुज़ारी है परिंदे की तरह। 

यहाँ जीवन की अनिश्चितता और क्षणभंगुरता का बेहद सहज और प्रतीकात्मक चित्रण है। ‘परिंदे’ की तरह जीने का भाव जीवन की निरंतर गति और अस्थिरता को व्यक्त करता है। 

तमाम उम्र जो ग़म में हमारी गुज़रीं थी, 
जो इक ख़ुशी भी मिली तो उदास रहने लगे। 

यहाँ जीवन के विरोधाभास की गहरी अभिव्यक्ति है। लगातार दुख सहते-सहते इंसान इतना आदी हो जाता है कि ख़ुशी भी उसे बेचैन कर देती है। डॉ. जाफ़री इस शेर के माध्यम से मानवीय मनोविज्ञान की उस जटिलता को उजागर करते हैं, जिसमें दुःख सहनशीलता का हिस्सा बन जाता है। 

डराया था मगरमच्छों ने घर से मत निकलना तुम, 
मगर हम मछलियाँ फिर भी इसी पानी में रहती हैं। 

यह शेर साहस और यथार्थ का जीवंत चित्र है। मगरमच्छ डर और ख़तरो का प्रतीक हैं, जबकि मछलियाँ जीवन जीने की अनिवार्यता को दर्शाती हैं। कवि बताता है कि भय के बावजूद जीवन की धारा में रहना ही हमारी नियति है। यह जीवन के साहसिक पक्ष को उभारने वाला शेर है। 

वो जब तलक रहे दोनों जहाँ के जैसे थे, 
पिता ज़मीन पे उस आसमाँ के जैसे थे। 

यह शेर पिता के महत्त्व और महिमा का अद्भुत चित्रण है। पिता को कवि ने धरती पर आसमान कहा है। यहाँ केवल पारिवारिक भाव नहीं बल्कि पिता के व्यक्तित्व की विराटता को रूपक में उकेरा गया है। यह शेर भावुकता और दर्शन दोनों का अद्भुत संगम है। 

वो शख़्स जो ग़ुरूर की मुट्ठी में बंद था, 
उस शख़्स को भी हाथ यहाँ खोलना पड़ा। 

यह शेर अहंकार के पतन की सच्चाई को प्रकट करता है। जीवन में कोई कितना भी घमंडी क्यों न हो, परिस्थितियाँ एक समय उसे विनम्र होने पर मजबूर कर देती हैं। यह शेर मनुष्य के व्यवहार और जीवन-दर्शन का गहरा उद्घाटन करता है। 

अब कहा दर्द की भाषा वो समझते होंगे, 
अपना रोना भी तमाशा वो समझते होंगे। 

यहाँ संवेदनहीनता पर करारा व्यंग्य है। आज का समाज दूसरों के दुख को गहराई से महसूस करने की क्षमता खोता जा रहा है। कवि कहता है कि अब लोग दर्द की भाषा समझना छोड़ चुके हैं और दूसरे का रोना भी उन्हें तमाशा लगता है। यह शेर हमारे समय की कठोरता का सटीक बयान है। 

कब तलक आँख में रह पाएँगे काजल बनकर, 
हम तो एक रोज़ बरस जाएँगे बादल बनकर। 

यह शेर मानवीय जीवन की क्षणभंगुरता और परिवर्तनशीलता को व्यक्त करता है। कवि कहता है कि हम सदा स्थिर नहीं रह सकते, एक समय ऐसा आता है जब हम बादल की तरह बरसकर सब कुछ बदल देते हैं। यहाँ आत्म-प्रकाश और जीवन-चक्र का सुंदर चित्रण है। 

ये और बात कोई मुश्किलें नहीं आईं, 
सफ़र, सफ़र ही रहा मंज़िलें नहीं आईं। 

यह शेर जीवन की यात्रा और उसकी अधूरी कामनाओं का मार्मिक चित्रण है। मंज़िल तक पहुँचे बिना यात्रा जारी रखना जीवन की उस विडंबना का प्रतीक है, जहाँ संघर्ष तो होता है लेकिन सफलता हाथ नहीं लगती। यह शेर निरंतरता और अधूरेपन दोनों का भाव प्रस्तुत करता है। 

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री की ग़ज़लों में जीवन के हर पहलू की गहरी पड़ताल मिलती है। पारिवारिक संवेदनाएँ, सामाजिक विसंगतियाँ, आधुनिक जीवन की विडंबनाएँ, प्रशासनिक उपेक्षाएँ और जीवन-दर्शन, सब उनकी शायरी में परिलक्षित होते हैं। वे केवल शायर नहीं, बल्कि यथार्थ के संवेदनशील व्याख्याकार भी हैं। 

वहीं आलोचना के क्षेत्र में उनका योगदान हिन्दी ग़ज़ल को अकादमिक स्तर पर प्रतिष्ठित करता है। इस तरह डॉ. जाफ़री की ग़ज़लधर्मिता और आलोचना-कर्म दोनों मिलकर उन्हें हिन्दी ग़ज़ल का विशिष्ट हस्ताक्षर बनाते हैं। उनकी शायरी यह विश्वास दिलाती है कि ग़ज़ल केवल इश्क़ की कहानी नहीं, बल्कि समय और समाज का दर्पण भी है। 

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि डॉ. ज़ियाउर रहमान जाफ़री ने ग़ज़ल को जिया है और अभी भी निरंतर जी रहे हैं। उनके शेर केवल भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि समय की आवाज़ हैं। उनकी आलोचना केवल बौद्धिक व्याख्या नहीं बल्कि साहित्यिक सरोकारों का निष्पक्ष मूल्यांकन है। इसीलिए वे आज हिन्दी ग़ज़ल के लिए न सिर्फ़ एक सशक्त शायर हैं, बल्कि एक मार्गदर्शक आलोचक भी हैं। 

हिन्दी ग़ज़ल का भविष्य निश्चय ही ऐसे शायर और आलोचक पर गर्व कर सकता है, जिनकी रचनाएँ आने वाली पीढ़ियों को नयी दृष्टि और नई दिशा देंगी। 

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