डॉ. शुक्ला की नज़र से डिजिटल हिंदी संबंधी नवाचारी अवधारणाएँ
डॉ. सोमदत्त काशीनाथ
समीक्षित पुस्तक: हिंदी भाषा और तकनीक’
लेखक: डॉ. शैलेश शुक्ला
प्रकाशक: न्यू मीडिया सृजन संसार ग्लोबल फाउंडेशन
लखनऊ (उत्तर प्रदेश)
मुद्रक: विश्वनाथ प्रेस, लखनऊ (उ.प्र.)
मूल्य: मुद्रित संस्करण: ₹251.00
किंडल संस्करण: ₹49.00
ISBN: 978-81-949867-3-7
पृष्ठ संख्या: 198
सारांश
डॉ. शैलेश शुक्ला जी की कृति ‘हिंदी भाषा और तकनीक’ हिंदी भाषा और आधुनिक तकनीकी जगत के अंतर्संबंध का गहन अध्ययन प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक केवल एक अकादमिक दस्तावेज़ ही नहीं, बल्कि हिंदी के डिजिटल भविष्य का एक ठोस मानचित्र है। लेखक ने इसमें हिंदी भाषा की ऐतिहासिक यात्रा से लेकर उसके समकालीन तकनीकी स्वरूप और आने वाले दशकों की चुनौतियों व संभावनाओं तथा सभी पहलुओं को समाहित किया है।
पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें गहन सिद्धांत, व्यावहारिक अनुभव और नीतिगत दृष्टि का संतुलित संयोजन है। प्रारंभिक अध्यायों में हिंदी के मुद्रण और प्रकाशन से लेकर डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म तक की यात्रा का वर्णन है, जबकि मध्य भाग में यूनिकोड, टाइपिंग टूल्स, वॉयस रिकग्निशन और मशीन ट्रांसलेशन जैसी तकनीकों का विश्लेषण किया गया है। लेखक ने न केवल उनकी उपयोगिता और योगदान पर चर्चा की है, बल्कि उनकी सीमाओं और कमियों को भी उजागर किया है। अंतिम अध्यायों में, डॉ. शैलेश शुक्ला जी द्वारा आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग, स्पीच-टू-टेक्स्ट और कॉर्पस विकास जैसे उभरते क्षेत्रों में हिंदी की भूमिका पर दूरदर्शी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है।
इस पुस्तक का एक महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि इसमें तकनीक को केवल औज़ार नहीं, बल्कि भाषा-सशक्तिकरण के साधन के रूप में देखा गया है। लेखक ने स्पष्ट किया है कि यदि हिंदी को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना है, तो सरकारी नीतियों, उद्योग जगत और शैक्षणिक संस्थानों को मिलकर प्रयास करना होगा। इसके साथ ही, उन्होंने सांस्कृतिक संरक्षण की आवश्यकता पर भी बल दिया है, ताकि डिजिटलीकरण केवल बाज़ार की माँग तक सीमित न रहकर भाषा की साहित्यिक और सांस्कृतिक गहराई को भी संरक्षित रख सके।
यह पुस्तक हिंदी जगत के लिए एक घोषणापत्र जैसी है। यह प्रेरित आज की पीढ़ी और आने वाली पीढ़ियों को करती है कि सही रणनीति, ठोस नीति और तकनीकी नवाचार के माध्यम से हिंदी न केवल भारत की डिजिटल भाषा बन सकती है, बल्कि वैश्विक डिजिटल अर्थव्यवस्था की सक्रिय सहभागी भी बन सकती है।
बीजशब्द
(हिंदी, तकनीक, डिजिटल, भाषा-सशक्तिकरण, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, मशीन ट्रांसलेशन, यूनिकोड, कॉर्पस विकास, वैश्विक दृष्टिकोण, सांस्कृतिक संरक्षण)
प्रस्तावना
डॉ. शैलेश शुक्ला जी की कृति ‘हिंदी भाषा और तकनीक’ हिंदी साहित्य, भाषा-विज्ञान और तकनीकी अध्ययन के संगम पर स्थित एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और दूरदर्शी रचना है। यह पुस्तक उस समय सामने आई है जब हिंदी भाषा को डिजिटल परिदृश्य में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करानी है और साथ ही साथ नए तकनीकी औज़ारों के साथ अपनी पहचान को विश्वस्तरीय मंच तक विस्तारित करना है। अब तक हिंदी पर लिखी गई तकनीकी कृतियों में या तो अत्यधिक सैद्धांतिक विमर्श पाया गाया है या उनमें केवल तकनीकी विवरणों का एक यांत्रिक संकलन मिलता है। डॉ. शुक्ला जी की यह कृति इन दोनों सीमाओं को पार करती है और भाषा तथा तकनीक के द्वंद्व को एक संवादात्मक धरातल पर रखती है। यही कारण है कि इसे केवल एक पुस्तक कहना उचित नहीं होगा, बल्कि यह हिंदी के भविष्य का एक मार्गदर्शक दस्तावेज़ है, जिसमें भाषा, समाज और तकनीक-तीनों को जोड़ने का ईमानदार प्रयास दिखाई देता है।
पुस्तक की संरचना और विषयगत संगठन
इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका सुव्यवस्थित संगठन है। प्रारंभिक अध्यायों में लेखक ने हिंदी भाषा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और मुद्रण-प्रकाशन की परंपराओं को विस्तार से रखते हुए यह समझाने का प्रयास किया है कि भाषा और तकनीक का सम्बन्ध नया नहीं है, बल्कि यह निरंतर विकसित होता आया है। छपाई, टाइपराइटर और समाचार पत्र से लेकर डिजिटल ब्लॉग, सोशल मीडिया और ई-पुस्तकों तक की यात्रा को उन्होंने क्रमबद्ध रूप से प्रस्तुत किया है। इससे पाठक को यह समझने में आसानी होती है कि भाषा के तकनीकी विकास का कोई आकस्मिक इतिहास नहीं है, बल्कि यह एक दीर्घकालिक प्रक्रिया का परिणाम है।
मध्य भाग में लेखक ने हिंदी भाषा के तकनीकी साधनों और सॉफ्टवेयरों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। यूनिकोड मानकीकरण, हिंदी टाइपिंग टूल्स, इनस्क्रिप्ट और फोनेटिक की-बोर्ड लेआउट्स, वॉयस रिकग्निशन तकनीक, मशीन ट्रांसलेशन, मोबाइल एप्लिकेशन और क्लाउड तकनीक—जैसी प्रणालियों की चर्चा करते समय उन्होंने केवल उनकी सूची प्रस्तुत नहीं की है, बल्कि उनकी सीमाओं और संभावनाओं का भी निष्पक्ष मूल्यांकन किया है। उदाहरण स्वरूप, गूगल ट्रांसलेट जैसे उपकरणों की चर्चा करते हुए वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि यद्यपि इनसे हिंदी की पहुँच वैश्विक स्तर तक बढ़ी है, परन्तु इस संसाधन के समक्ष संदर्भगत सटीकता की कमी अभी भी एक गंभीर चुनौती है।
पुस्तक के अंतिम अध्यायों में लेखक का दृष्टिकोण और भी अधिक भविष्यवादी हो जाता है। यहाँ डॉ. शैलेश शुक्ला जी नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP), आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस, स्पीच-टू-टेक्स्ट, टेक्स्ट-टू-स्पीच और बहुभाषी डेटा माइनिंग जैसे क्षेत्रों में हिंदी की संभावनाओं और चुनौतियों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। वे इस बात पर बल देते हैं कि इन क्षेत्रों में हिंदी को सशक्त बनाने के लिए बड़े पैमाने पर कॉर्पस विकास और भाषाई शोध आवश्यक है। इस प्रकार यह कृति केवल वर्तमान की ज़रूरतों तक सीमित न रहकर आने वाले दशकों के लिए भी एक सुसंगत रोडमैप प्रस्तुत करती है।
पुस्तक का भाषिक और शैलीगत स्वरूप
तकनीकी विषयों पर प्रायः देखा गया है कि लेखन शैली अत्यधिक जटिल और दुरूह हो जाती है। किन्तु डॉ. शुक्ला जी की लेखन-शैली इस पूर्वधारणा को तोड़ती है। उन्होंने तकनीकी शब्दावली का प्रयोग अत्यंत सावधानीपूर्वक किया है और जहाँ अंग्रेज़ी के शब्दों की आवश्यकता पड़ी, वहाँ उन्हें कोष्ठक में रखकर उनके सरल हिंदी रूप भी दिए हैं। यह पद्धति न केवल इस पुस्तक को पाठकों के लिए समझने हेतु सहज बनाती है, बल्कि राजभाषा नीति के अनुरूप हिंदी की तकनीकी शब्दावली के मानकीकरण में भी योगदान देती है।
भाषा-शैली का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें सूचनात्मकता और प्रेरणात्मकता दोनों का सुंदर संयोजन दिखाई देता है। पाठक केवल तकनीकी जानकारी ही प्राप्त नहीं करता, बल्कि उसे यह भी अनुभव होता है कि हिंदी भाषा तकनीक के माध्यम से कितनी दूर तक जा सकती है। यही कारण है कि यह पुस्तक राजभाषा-कर्मियों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और आम पाठकों-सभी के लिए प्रासंगिक सिद्ध होती है।
हिंदी भाषा और तकनीक: लेखक का दृष्टिकोण
डॉ. शुक्ला जी का दृष्टिकोण यह है कि हिंदी का भविष्य केवल उसके साहित्यिक गौरव पर ही नहीं टिका है, बल्कि इस बात पर भी निर्भर है कि वह तकनीक के साथ कितनी सफलतापूर्वक तालमेल बिठा पाती है। वे तकनीक को केवल एक उपकरण के रूप में नहीं देखते, बल्कि भाषा-सशक्तिकरण के साधन के रूप में प्रस्तुत करते हैं। डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म, सोशल मीडिया, मोबाइल ऐप्स, मशीन ट्रांसलेशन और ए.आई.—ये सभी हिंदी के प्रसार और प्रभाव को कई गुना बढ़ा सकते हैं।
उनकी दृष्टि केवल व्यावहारिक नहीं है, बल्कि उसमें एक गहन नीतिगत आयाम भी है। वे सुझाव देते हैं कि सरकारी वेबसाइट्स, ई-गवर्नेंस, मोबाइल एप्लिकेशन और सार्वजनिक सेवाओं में हिंदी को अनिवार्य बनाया जाए, ताकि यह भाषा प्रशासनिक और तकनीकी दोनों स्तरों पर मज़बूती से स्थापित हो सके। यह दृष्टिकोण हिंदी को केवल सांस्कृतिक गौरव की भाषा भर नहीं रहने देता, बल्कि उसे डिजिटल अर्थव्यवस्था का सक्रिय भागीदार बना देता है।
सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव और भाषा-सशक्तिकरण
डॉ. शुक्ला जी की कृति का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें तकनीक और भाषा के सम्बन्ध को केवल यांत्रिक या औज़ारगत स्तर पर नहीं देखा गया है, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से भी उसका गंभीर विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। हिंदी भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक आत्मा और लोकजीवन की संवहन-शक्ति भी है। लेखक का मानना है कि यदि तकनीकी युग में हिंदी का स्थान सुनिश्चित करना है तो उसे केवल उपयोगी बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसे ऐसा स्वरूप भी देना होगा जिससे कि सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिकता को सँजोया जा सके। इसीलिए वे डिजिटल आर्काइव, ऑनलाइन साहित्यिक भंडार, लोकगीतों और लोक-कथाओं के संग्रह तथा क्षेत्रीय बोलियों के डिजिटलीकरण की दृढ़ता से सिफ़ारिश करते हैं। उनका यह दृष्टिकोण स्पष्ट करता है कि तकनीक केवल आधुनिकीकरण का साधन नहीं है, बल्कि परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य भी कर सकती है।