अकेलापन
सौरभ नोरोजी
छोटा बच्चा था जब मैं
सब प्यार से मुझे बुलाते थे,
बड़े प्रेम और नादानी से
मुझको ख़ूब खिलाते थे।
उम्र भी बढ़ती जाती है और
दोस्त भी बनते जाते हैं
करते हैं वो दग़ाबाज़ियांँ
साथ ना दे वो पाते हैं।
परिवार का प्रेम न मिला,
हूँ अभी मैं उससे दूर।
प्रेमिका न मिली कभी और
अभी प्रेमिका है अतिदूर।
पसंद किसी की बन न पाया
साथ किसी का मिल न पाया।
उम्मीदों पर खरा न उतरा,
आशाओं के जाल ने जकड़ा।
विचार मेल न खाते हैं,
लोग दूर हो जाते हैंं।
ऊपर-ऊपर प्रेम दिखाते
मन से मुझे कभी न चाहते,
झूठा प्रेम दिखाते हैंं
और छोड़ के मुझको जाते हैं।
भीड़ में लोगों से मिलता
लगते सब अपने हैं,
पर फिर भी मुझको लगता है
यह सब केवल सपने हैं।
किसी का आना किसी का जाना
कितना चुभ जाता है,
रखो उम्मीदें न किसी से
दुखों को और बढ़ता है।
अंत तक यह अकेलापन मुझे खायेगा
तोड़ देगा उम्मीदें, आशाएँ और
आँसुओं में झलक जाएगा।
शायद कठिन होगा ये सफ़र,
पर अकेले ही बिताया जाएगा।