अजीब बात है

15-01-2026

अजीब बात है

हरदीप सबरवाल (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

हमारे यहाँ 
सब कुछ आम सा है, 
घरों में जब तब घुस कर कोई वर्दी वाला, 
नहीं लेने लगता तलाशी 
और ना ही हमारे घर की औरतों की अलमारियों से 
उनके अधोवस्त्र निकाल कर 
उन्हेंं दीवारों की खूँटियों पर टाँग कर 
अपमानित करता है, 
 
हमारे खेतों में 
जब तब नहीं गिरते 
आसमान से गोले या ज़िन्दा बंब 
और ना ही हमारे ज़िन्दा बच्चे 
किसी ज़िन्दा बंब को छूकर मर जाते हैं 
या बीज देते हैं वो कोई ऐसी फ़सल, 
जिनमें से बंदूकें पैदा हों, 
 
हमारे घरों में जवान हो रहे लड़कों को 
यकायक सड़क पर चलते कोई 
गोली मार कर औंधे मुँह नहीं गिराता, 
ना ही कोई उन्हेंं आतंकवादी बता कर घरों से 
इस तरह नहीं ले जाता कि 
वो कभी वापस नहीं आते, 
 
पिछली सदी की बातें अब यहाँ नहीं घटतीं, 
कि हम शांतिप्रिय लोग हैं, 
लेकिन 
हम उतनी ही शिद्दत से अपमानित किए जाते हैं 
पुलिस थानों और चौकियों में जब 
हम अपनी जब तब अपमानित हुई किसी बेटी 
के लिऐ इंसाफ़ ढूँढ़ने जाते हैं और
उतनी ही निर्लज्जता से 
चरित्र हनन होते हैं हमारी बेटियों के, 
 
हमारे यहाँ किसान ना जाने क्या बीजते हैं 
कि फ़सल के साथ साथ ही उग जाते हैं 
तमाम कारण 
आत्म-हत्यायों के, 
 
नौकरी ढूँढ़ने घर से निकलते हमारे युवा
ना जाने क्यूँ साँझ ढलते ढलते 
औंधे मुँह
किसी सुने पार्क में नशे में गर्त नज़र आते हैं, 
 
हम लोग तुम लोगों से अलग हैं 
कि हम शांतिप्रिय हैं 
पर हम भी जाने क्यों हर पल 
डरे सहमे से रहते हैं, तुम्हारी तरह 
अनजानी आशंकाओं से घिरे 
अजीब बात है! 

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