आमार सोनार बांग्ला

15-01-2026

आमार सोनार बांग्ला

डॉ. अमित रंजन (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

यह वर्ष पूरे दक्षिण एशिया के लिए उथल-पुथल भरा था। पूर्वी पाकिस्तान भी धीरे-धीरे विद्रोह की आग में जलने लगा था। दरअसल बात यह थी कि पश्चिमी पाकिस्तान की सत्ता हमेशा से पूर्वी पाकिस्तान के लोगों के साथ भेदभाव करती रही थी। उनकी भाषा, संस्कृति और पहचान को कुचलने की कोशिश की जा रही थी। जब पाकिस्तान ने उर्दू को एकमात्र राष्ट्रीय भाषा घोषित किया और बंगाली भाषा को पीछे धकेल दिया, तब पूर्वी पाकिस्तान में आक्रोश भड़क उठा। 

ढाका यूनिवर्सिटी उन जगहों में से एक थी, जहाँ इस विद्रोह की सबसे ज़्यादा गूँज सुनाई दे रही थी। यूनिवर्सिटी के युवा छात्रों ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। इन्हीं छात्रों में शामिल थे यूसफ़ और पूनम। 

यूसफ़, एक तेज़-तर्रार और ज़िंदादिल बंगाली मुस्लिम युवक था, जिसे अपने देश से बेहद प्यार था। दूसरी तरफ़, पूनम एक हिंदू लड़की थी, जिसका परिवार पीढ़ियों से बंगाल में बसा हुआ था। वे दोनों बचपन के दोस्त थे, जो धीरे-धीरे एक-दूसरे के क़रीब आ गए थे। उनके प्रेम को धर्म की दीवारों ने रोकने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने इसे हमेशा अनदेखा कर दिया। 

यूसफ़ अक्सर मुस्कुराते हुए कहता, “अगर प्यार मज़हब पूछता, तो वह प्यार नहीं होता, पूनम। देखना, मैं तुम्हारे लिए हिंदू बन जाऊँगा!”

पूनम हँसते हुए कहती, “और अगर मैं मुसलमान बन जाऊँ तो?” 

यूसफ़ शरारत से जवाब देता, “फिर तो दुनिया को मानना पड़ेगा कि प्यार किसी मज़हब का मोहताज नहीं होता!”

लेकिन उनका प्यार अब सिर्फ़ प्रेमकहानी नहीं रह गया था। यह अब एक क्रांति का हिस्सा बन चुका था। 

चुनाव में शेख़ मुजीबुर्रहमान की आवामी लीग ने भारी जीत दर्ज की थी, लेकिन सत्ता पश्चिमी पाकिस्तान ने अपने पास ही रखी। जब जनरल याह्या खान ने मार्शल लॉ लगाकर विरोध को दबाने की कोशिश की, तो पूर्वी पाकिस्तान में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। 

25 मार्च 1971 की रात को पाकिस्तानी सेना ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ शुरू किया। यह वह रात थी जब ढाका की सड़कों पर ख़ून बहाया गया। यूनिवर्सिटी हॉस्टल में घुसकर हज़ारों छात्रों को गोली मार दी गई। 

यूसफ़ और पूनम भी उसी रात अपने साथियों के साथ यूनिवर्सिटी में थे। जैसे ही सैनिकों ने धावा बोला, उन्होंने अपनी जान बचाने के लिए भागना शुरू किया। 

“पूनम, हमें यहाँ से निकलना होगा!” यूसफ़ ने उसका हाथ पकड़ा। 

“कहाँ जाएँगे?” पूनम ने हाँफते हुए पूछा। 

“सुंदरवन के रास्ते भारत। वहाँ हमारे मुक्ति बाहिनी के कुछ लड़ाके हैं। वे हमें सहारा देंगे।”

लेकिन तभी सैनिकों ने उन्हें घेर लिया। गोलियों की आवाज़ के बीच, यूसफ़ ने किसी तरह पूनम को भागने का मौक़ा दिया यद्यपि की वह ख़ुद पकड़ा गया। 

“भागो पूनम! यह क्रांति ज़िंदा रहनी चाहिए!”

यूसफ़ को सैनिकों ने पकड़ लिया। उसे एक अज्ञात जेल में ले जाया गया। वहाँ उसे अमानवीय यातनाएँ दी गईं। 

“तुम्हारे जैसे देशद्रोही को ज़िन्दा रहने का कोई हक़ नहीं!” एक सैनिक ने उस पर कोड़े बरसाते हुए कहा। 

“अगर समानता की बात करना, अतिवाद का विरोध करना देशद्रोह है, अपनी भाषा, संस्कृति की रक्षा करना देशद्रोह है, मानवता और अपने हक़ के लिए लड़ना देशद्रोह है, तो हाँ, मैं देशद्रोही हूँ!” यूसफ़ ने ख़ून से सना चेहरा उठाकर जवाब दिया। 

“आमार सोनार बांग्ला” भावना के आवेश में यूसफ़ ज़ोर से चीख़ पड़ा। 

सैनिकों ने पूनम के बारे में पूछताछ की, लेकिन यूसफ़ ने अपना मुँह नहीं खोला। पूनम के प्यार के आगे वे अमानवीय यातनाएँ रेत का ढूह सिद्ध हुई। 

उधर पूनम भागती रही। रात के अँधेरे में वह ढाका से दूर होती चली गई। वह जानती थी कि अगर वह किसी के हाथ लग गई, तो उसकी हत्या कर दी जाएगी या उससे भी बुरा हो सकता था। 

दो दिन तक वह भूखी-प्यासी जंगलों और गाँवों से होते हुए सुंदरवन के दलदल तक पहुँची। सुंदरवन का जंगल उसके लिए एक भयानक सपने की तरह था। कई बार जब उसकी हिम्मत टूटने सी लगती तब यूसफ़ का प्यार उसके लिए ताक़त बन जाता। वह भागती रही। 

सुंदरवन, जहाँ हर क़दम पर मौत छुपी थी—कीचड़ में फँसने का ख़तरा, खारे पानी के मगरमच्छ, जंगली बाघ और हर तरफ़ फैली घनी झाड़ियाँ। कीचड़ में फँसकर वह बार-बार गिरती और उठती। उसके कपड़े तार-तार हो गए और उसका शरीर थककर चूर हो चुका था। अचानक उसने पीछे से एक गुर्राहट सुनी। पीछे मुड़ कर देखा तो एक रॉयल बंगाल टाइगर था। चिड़ियाघर में जो बाघ . . . अभी उसे साक्षात्‌ मौत का दूत नज़र आ रहा था। 

वह काँप गई। बाघ उसकी ओर बढ़ रहा था। उसने अपनी आख़िरी हिम्मत जुटाई और पास की नदी में छलाँग लगा दी। ठंडा पानी उसकी नसों में बिजली की तरह दौड़ गया। यद्यपि की बाघ एक कुशल तैराक होते हैं लेकिन पता नहीं क्यों वह बाघ उसके पीछे पानी में नहीं आया। शायद उसकी क़िस्मत अच्छी थी, शायद बाघ भूखा नहीं था। 

दूसरी तरफ़ पहुँचने पर उसे एक नाव मिली। वह नाव में बैठकर धीरे-धीरे भारत के जल क्षेत्र में दाख़िल हुई। रात के अँधेरे में दूर उसे टिमटिमाती रोशनी नज़र आई। वह समझ गयी कि वहाँ मानव बस्ती है। उस रोशनी का पीछा करते करते पूनम गाँव में प्रवेश कर गई और उसने एक दरवाज़े पर दस्तक दी। 

इतनी रात को दरवाज़े पर हुई दस्तक ने घर के मालिक को सशंकित कर दिया। घर के अंदर सिर्फ़ दो जन थे, एक महिला और एक पुरुष। पुरुष ने अपने हाथों में एक छोटी सी लाठी ले ली और दरवाज़े की ओर बढ़ा। महिला भी उसके पीछे हो ली। धड़कते दिल से उन्होंने दरवाज़े को खोला और चौंक गए। दरवाज़े पर कीचड़ से लथपथ एक युवती थी जिसके कपड़े फटे हुए थे। उन्होंने उस युवती को अपने घर के अंदर ले लिया। 

“पूनम?” 

इतना कहकर पूनम बेहोश होकर गिर पड़ी। 

जब उसे होश आया, तो घर की युवती ने उसे खाना दिया। 

“घबराओ मत। तुम सुरक्षित हो। तुम बच गई,” युवती ने आँसू भरी आँखों से पूनम से कहा। 

“मुझे नहीं पता कि इसे बचना कहूँ या बिखरना,” पूनम की आवाज़ में एक गहरा दर्द था। 

♦ ♦

गया ज़िले के एक छोटे से गाँव में, जहाँ जाति और धर्म के नाम पर लोगों को बाँटा जाता था एक युवा जोड़ा प्यार कर बैठा। उनका प्यार समाज के ठेकेदारों और तथाकथित पहरुओं के लिए एक बग़ावत की तरह था। युवक के परिवार ने उसे धमकियाँ दीं, जबकि युवती के परिवार ने उसे घर से निकाल दिया। 

“अब हम कहाँ जाएँगे?” युवती ने रोते हुए अपने प्रेमी से पूछा। 

“कोलकाता। वहाँ कोई हमें नहीं जानता। हम वहाँ नई ज़िन्दगी शुरू करेंगे,” युवक ने दृढ़ता से कहा। 

प्रेमी युगल रात के अँधेरे में गया से कोलकाता के लिए निकल पड़े। ट्रेन में बैठी युवती के मन में भावनाओं का आलोड़न-विलोड़न हो रहा था। वह सोच रही थी कि अगली सुबह जैसे ही गाँव वालों को उनके भागने की ख़बर मिलेगी उसके परिवार पर दुःखों का पहाड़ टूट पड़ेगा। माँ-बाप की बदनामी होगी। छुटकी को याद कर उसकी आँखें भर आयी। वह अपनी बहन छुटकी से बहुत प्यार करती थी। अब शायद ही उसकी शादी हो। 

युवती को बहुत देर से चुप और गुमसुम बैठा देख युवक ने उससे पूछा, “क्या सोच रही हो?” 

“क्या हमारा प्यार इतना कमज़ोर है कि समाज के डर से भागना पड़े?” सवाल का जवाब देने के बजाए युवती ने प्रति प्रश्न किया। 

युवक ने उसका हाथ थामा, “नहीं प्रिये, हम भाग नहीं रहे हैं। हम अपने प्यार को बचाने के लिए लड़ रहे हैं।”

कोलकाता में उन्होंने एक छोटा-सा कमरा किराए पर लिया। युवक ने एक छोटी-सी दुकान खोली, जबकि युवती ने सिलाई का काम शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी ज़िन्दगी को सँवारना शुरू किया लेकिन समाज के ठेकेदार वहाँ भी पहुँच गए। तब वे कलकत्ता से भी दूर सुंदरवन के पास एक गाँव में जाकर रहने लगे। युवक का नाम था सुमित और युवती थी प्रियंका और इन्हीं के घर पर रात्रि को पूनम ने दस्तक दी थी। 

होश में आने पर पूनम ने अपनी सारी दास्तान सुमित और प्रियंका को कह सुनाई। दोनों एक ही नाव के सवारी थे। सो उन्होंने पूनम को अपने ही पास रख लिया और कहा, “जब तक आप स्वस्थ नहीं हो जातीं और जब तक आपके मुल्क के हालात नहीं बदल जाते आप यहीं हमारे साथ रहेंगी।” 

जल्द ही पूनम प्रियंका और सुमित के साथ ऐसे घुलमिल गयी मानो वे एक दूसरे को वर्षों से जानते हों। प्रियंका अक्सर पूनम से चुहल करती और कहती, “तुम भी मुस्लिम रीति-रिवाज़ सीख लो।” पूनम हँसती और कहती, “यूसफ़ तो इतना ब्रॉडमाइंडेड है कि वह मुझे कभी कुछ नहीं कहता।”

16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश एक आज़ाद देश बन गया। पूनम तुरंत ढाका लौटी, जहाँ उसने देखा कि यूसफ़ ज़िन्दा था। वह घोर यातनाओं के बाद भी बच गया था। 

उन्होंने शादी कर ली और बांग्लादेश के पुनर्निर्माण में लग गए। 

यूसफ़ सुमित और प्रियंका का बहुत अहसानमंद था कि उन्होंने पूनम को शरण दी थी। दोनों परिवारों के बीच गहरे सम्बन्ध बन गए। वे आपस में संवाद करते रहते थे। 

लेकिन समय के साथ दोनों परिवारों का आपसी संवाद कम होता गया। सुमित ने सोचा कि यूसफ़ और पूनम अपनी दुनिया में व्यस्त हो गए होंगे। कई साल बीत गए। 

♦ ♦

एक दिन प्रियंका ने ढाका जाने की इच्छा जताई। सुमित हिचकिचाए, “वहाँ कहाँ रहेंगे? बांग्लादेश के हालात भी अच्छे नहीं हैं।” लेकिन प्रियंका ने ज़िद की, “यूसफ़ भाईजान और पूनम से भी मिल लेंगे। वे अक्सर बुलाते भी रहते हैं।” आख़िरकार, सुमित मान गए। 

ढाका पहुँचकर सुमित और प्रियंका पूनम के घर गए। लेकिन वहाँ उन्होंने एक अजीब सी ख़ामोशी और तनाव का अनुभव किया। पूनम, जो कभी जीन्स पहनती थी, अब बुर्क़े में थी। उसने इस्लाम धर्म अपना लिया था। उसने पूरी तरह से ख़ुद को घर की चाहरदीवारी तक सीमित कर लिया था। यूसफ़ भी पहले जैसा नहीं रहा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता और विवशता थी। सुमित और प्रियंका को यह सब देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। उन्होंने महसूस किया कि बांग्लादेश में चरमपंथी तत्त्व हावी हो गए हैं। विदेशियों, ख़ासकर भारतीयों और दूसरे धर्म के लोगों को देखना वहाँ के लोग पसंद नहीं कर रहे थे। सुमित और प्रियंका को वहाँ रहने में दिक़्क़त हो रही थी। वे भारत लौट आए। 

कुछ दिनों बाद, एक ख़बर आई—

“बांग्लादेश में कट्टरपंथियों द्वारा ग़ैर-मुस्लिम महिलाओं को चुन-चुनकर मारा जा रहा है। पूनम, जिसे अब फ़ातिमा कहा जाता था, को भी मार दिया गया।”

प्रियंका और सुमित एक-दूसरे को देखते रह गए। 

“क्या यही वह बांग्लादेश है, जिसके लिए यूसफ़ और पूनम ने संघर्ष किया था? क्या यही वह आज़ादी है, जिसके लिए इतने लोगों ने अपनी जानें गँवायी थीं?” उनके मन में गहरी उदासी थी। 

“क्या कट्टरपंथ को मिटाया जा सकता है?” 

बांग्लादेश ने पाकिस्तान से मुक्ति तो पा ली थी, लेकिन क्या वह अपने असली मूल्यों को बचा पाया? 

यूसफ़ और पूनम का प्रेम, जो धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक था, कट्टरपंथ की आग में जल चुका था। 

“आमार सोनार बांग्ला, आमी तोमाय भालोबाशी . . . “

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