विडम्बना

02-06-2016

विडम्बना

सुशांत सुप्रिय

तुम आई
और मैं तुम्हारे लिए
सर्दियों की
गुनगुनी धूप हो गया

तुमने मुझे देखा
और मैं तुम्हारे लिए
गर्मियों की
घनी छाँह हो गया

तुम्हें एक बग़ीचे की
ज़रूरत थी
और वह मैं हो गया

मैं तुम्हारी प्यास के लिए
मीठे पानी का
कुआँ हो गया

मैं तुम्हारी भूख के लिए
तवे पर फूली हुई
रोटी हो गया

सुस्ता कर
अपनी भूख-प्यास मिटा कर
तुम एक बार फिर
तरो-ताज़ा हो गई

और तब
मैंने देखा
तुम पूछ रही थीं :
"कहाँ रह गया
वह बेवक़ूफ़-सा आदमी
जो मेरी मदद करने का
दावा कर रहा था!"

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