हिन्दी टीचर

01-06-2020

हिन्दी टीचर

डॉ. कुँवर दिनेश

दिव्यांश किंडरगार्टन में पढ़ रहा था। क्रिश्चन मिशनरियों का कॉन्वेंट स्कूल था। बेटा शहर में सबसे महँगे स्कूल में पढ़ रहा था, इस बात से उसके माता-पिता दोनों बहुत प्रसन्न थे और गौरवान्वित अनुभव कर रहे थे। 

दिव्यांश के पिता सरकारी स्कूल में हिन्दी के अध्यापक थे। एक दिन उन्होंने उसकी हिन्दी की अभ्यास-पुस्तिका को बाँचना शुरू किया। वे पन्ने पलट रहे थे कि अचानक उनकी नज़र हाल ही के कक्षा-कार्य वाले पृष्ठ पर जा टिकी। उन्होंने देखा सप्ताह के दिनों के नाम लिखवाए गए थे। मात्राओं की अशुद्धियाँ देख कर उन्हें बहुत बुरा लगा। बच्चे ने रविवार को रवीवार; गुरुवार को गुरवार; शुक्रवार को शक्रवार; शनिवार को शनीवार लिखा था और टीचर ने  उन सभी को टिक लगाकर सही दिखाया हुआ था। 

टीचर के कैज़ुअल रवैये को देखते हुए दिव्यांश के पिता स्कूल के हैडमास्टर से मिले और उन्हें बताया कि ये त्रुटियाँ तो भाषा के अभ्यास के लिए ठीक नहीं हैं। हैडमास्टर ने भी बड़े ही कैज़ुअल अंदाज़ में कहा, “यह टीचर अभी नई-नई है. . . हमारी मिशनरी में काम करने वाले एक ग़रीब चपरासी सैमुअल की बेटी है. . . अभी-अभी इसने ग्रैजुअशन किया है. . . मेहनती बहुत है. . . इसे थोड़ा समय दीजिए, यह सँभाल लेगी. . . बस कुछ मोहलत दीजिए. . .” 

दिव्यांश के पिता हैडमास्टर के उत्तर से आश्चर्यचकित थे। वे इतना ही कह पाए, “महोदय, इसमें टीचर के अमीर-ग़रीब होने अथवा नई-पुरानी होने का तो कोई प्रश्न ही नहीं है, मैं तो केवल इतनी विनती कर रहा हूँ कि कम-से-कम वर्तनी को शुद्ध रखा जाए और सही ढंग से बच्चों को सिखाया जाए. . . यही समय है इन कच्चे घड़ों को आकार देने का. . . एक सप्ताह में मात्र सात दिन होते हैं, और उनमें से चार को ग़लत ढंग से लिखवाया जा रहा है तो क्या बनेगा?”  

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