डरावनी बात

22-07-2014

डरावनी बात

सुशांत सुप्रिय

एक दिन
मैं अपने घर गया
लेकिन वह मेरे घर जैसा
नहीं लगा


मकान नम्बर वही था
लेकिन वहाँ रहते
सगे-सम्बन्धी
बेगाने लगे


गली वही थी
लेकिन वहाँ एक
अजनबीपन लगा


पड़ोसी वे ही थे
लेकिन उनकी आँखें
अचिह्नी लगीं


यह मेरा ही शहर था
लेकिन इसमें
अपरिचय की
तीखी गंध थी


यह एक डरावनी बात थी
इससे भी डरावनी बात यह थी कि
मैंने पुकारा उन सब को
उन के घर के नाम से
लेकिन कोई अपना वह नाम
नहीं पहचान पाया

0 टिप्पणियाँ

कृपया टिप्पणी दें

लेखक की अन्य कृतियाँ

कविता
अनूदित कहानी
कहानी
कविता-मुक्तक
विडियो
ऑडियो