धन्यवाद-ज्ञापन

02-06-2016

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सुशांत सुप्रिय

मैं उनका कृतज्ञ हूँ
जिन्हें मैं घृणा नहीं करता

 

घृणा मुझमें विष भर देती

 

मैं उनका ऋणी हूँ
क्योंकि घृणा मुझे
अपनी ही निगाहों में
बौना बना देती

 

मुझे ख़ुशी है कि
मेरे जीवन की रेत-घड़ी में
उनकी वज़ह से
कोई तूफ़ान नहीं आते

 

उनकी वज़ह से
मैं नहीं हूँ अशांत
मेरी भाषा उनकी वज़ह से
नहीं होती अशिष्ट
मेरे संस्कार उनकी वज़ह से
नहीं होते फूहड़

 

वे नहीं जानते कि उनके
कितने अहसान हैं मुझ पर

 

यह उनकी ही उपलब्धि है कि
मुझमें बची हुई है अब भी मनुष्यता
कि मेरा क्षितिज भरा हुआ है अब भी
सकारात्मक और रचनात्मक ऊर्जा से
कि मेरे भीतर बची हुई है अब भी
ऊष्मा प्रेम की

 

मैं धन्यवाद देता हूँ उन्हें
क्योंकि उन्हीं की वज़ह से
बचा हुआ है अब भी
मेरा विश्वास जीवन में

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