बालियाँ

01-09-2020

बालियाँ

सौरभ मिश्रा

गुज़रते हुए
सुनहली बालियों से
गेहूँ की
मुझे याद हो आईं
तुम्हारे कान की बालियाँ
उनकी छुअन से 
उँगलियों में जगी गुदगुदाहट
और महक से मन में जगी
मिठास,
याद दिला गईं
तुम्हारे हाथों से आकार पाईं
रोटियों का स्वाद,
आग की गोद से छीनकर
रोटी
मुझे परोसते हुए
दबे मन से, तुमने
चाही थी बालियाँ
 
     ये असंख्य
     सोनमयी पकी बालियाँ
     मुझे दे रही हैं विश्वास
     किसी साँझ
     मुट्ठी में दबाए
     दो बालियाँ 
     लौटूँगा तुम्हारे पास।

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