अंतस की पीड़ा

01-03-2021

अंतस की पीड़ा

भारती परिमल

घड़ी के अलार्म की कर्कश आवाज़ के साथ ही उर्मि की नींद खुली और उसने अनमने मन से करवट बदलते हुए आँखे बंद किए हुए ही हाथों से टटोलते हुए घड़ी को हाथ में लिया और बड़ी मुश्किल से आँख खोल कर तिरस्कार भरी नज़रों से समय देखते हुए एक ही झटके में अलार्म बंद कर दिया। चलो, पीछा छूटा। अब तो यह कर्कश आवाज़ कानों में नहीं पड़ेगी। मन ही मन ये सोचते हुए फिर से वह चादर सिर पर तान कर सो गई। किंतु उसकी केवल आँखें ही बंद थी, नींद तो इस तेज़ आवाज़ के साथ ही टूट गई थी। आखिर चादर एक तरफ़ सरकाकर वह आलस लेते हुए बैठ गई। उसके पास ही आकाश निश्चिंत हो कर सो रहा था। उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता अलार्म से। रोज़ की आदत के मुताबिक़ रात एक बजे तो वह क्लब से ही आया था। फिर तो उसका भरपूर नींद लेना स्वाभाविक ही था। उर्मि के चेहरे पर झल्लाहट और कड़वाहट दोनों ही एक साथ उभर आई। फिर उसने एक ही झटके में चेहरे पर आँखों के सामने आए बालों की तरह विचारों को भी झटका और फ़्रेश हो कर जॉगिंग सूट और शूज़ पहन कर, बालों पर ब्रश फेरते हुए घर से बाहर निकल गई। बाहर भोर का हल्का उजाला फैल रहा था और इसी उजास को अपने दिलो-दिमाग़ में भरने के लिए उसने कार स्टार्ट की और पार्क की ओर मोड़ दी। वह जानती थी कि वहाँ और भी अपने जैसे आधुनिकता की दौड़ में शामिल कुछ दौड़ते-भागते, तो कुछ धीमी गति से चलते, तो कुछ योगाभ्यास या व्यायाम करते हुए लोग मिल ही जाएँगे।

पार्क में आकर वह इसी दृश्य से रूबरू हुई। उसके सोचे अनुसार सभी लोग अपने-अपने क्रियाकलापों में व्यस्त थे। उन सभी की व्यस्तता की ओर एक दृष्टि डालते हुए वह कोने की एक बेंच पर जाकर बैठ गई। यहाँ एकांत में आकर बैठना उसे अच्छा लगा। चारों ओर जहाँ तक नज़र दौड़ाओ, हरियाली ही हरियाली, पक्षियों का कलरव, फ़व्वारे से आती हुई पानी की बौछारें, रंग-बिरंगे फूलों की ख़ुशबू, मख़मली घास का कोमल स्पर्श। इन सभी प्राकृतिक वातावरण में वह ऐसे डूब गई कि एक पल को तो वह स्वयं को ही भूल गई।

बेंच के समीप ही खिले हुए लाल गुलाब की पंखुड़ियों पर पड़ी ओस की बूँद को वह एकटक देख रही थी कि अचानक कहीं से एक तितली आकर उस गुलाब पर आ बैठी। उसके बैठने से वह ओस की नन्हीं बूँद ज़मीन पर ढुलक गई। उसे यूँ लगा कि जैसे उस बूँद के रूप में उसका बचपन नीचे गिर पड़ा है।

बचपन… हिरनी की तरह कुलाँचे भरता बचपन पंछी की तरह अपने पंखों को आकाश में फैलाए उन्मुक्त उड़ान भरता बचपन… इंद्रधनुषी रंगों से अछूता अपने ही रंग में रँगा बचपन... भोर की पहली किरण-सा जीवन के आँगन में उतरता बचपन... इस बचपन से उसे कोई शिकायत न थी। तीनों भाई-बहनों में वह सबसे बड़ी थी। माँ चाहती थी कि घर की बड़ी बेटी होने के नाते वह उनके कामों में हाथ बँटाए, छोटे भाई-बहनों को सँभालने में उनकी मदद करे, पर वह हमेशा माँ की बात टालती रहती थी। उसका पूरा ध्यान हमेशा पढ़ाई की ओर ही रहता। स्कूल और घर दोनों ही जगह वह पढ़ाई में ही उलझी रहती। उसे कॉपी-किताबों के बीच घिरे रहना ज़्यादा अच्छा लगता था। ईश्वर ने सुंदरता और विद्या दोनों ही खुले हाथों उसे दी थी। यही कारण था कि एम.एससी. करने के बाद उसने एमबीए किया और सौभाग्य से उसे तुरंत ही मार्केटिंग के क्षेत्र में अच्छी जॉब मिल गई।

उर्मि की इस सफलता से माता-पिता भी ख़ुश थे। और उर्मि? उसका तो बचपन से देखा गया एक स्वप्न ही इस जॉब के रूप में साकार हो उठा था, तो उसकी ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था। ऑफ़िस में भी उसने अपने काम से सभी का मन जीत लिया था। यही कारण था कि बॉस ने उसे एक काम के सिलसिले में दूसरे शहर भेजा था। वहाँ दिल्ली ऑफ़िस में उसकी मुलाक़ात आकाश से हुई। आकाश का व्यक्तित्व देख कर वह उस पर मोहित हो गई थी। आकाश भी उससे कम प्रभावित नहीं हुआ था, तभी तो उसने शाम के भोजन के लिए उसे आमंत्रित किया। उर्मि ने भी ख़ुशी से उसका निमंत्रण स्वीकार कर लिया। होटल के उस हॉल की एक घंटे की मुलाक़ात ने दोनों को घनिष्ठ मित्र बना दिया था। वापस शहर आने पर दोनों के बीच फोन पर बातचीत का सिलसिला चल पड़ा। जॉब से जुड़ी बातों ने व्यक्तिगत बातों का और व्यक्तिगत बातों ने प्रेम का रूप ले लिया। उन्होंने शादी कर घर बसाने का फ़ैसला किया, मगर रुकावट एक ही थी– उर्मि की जॉब। वह ये जॉब छोड़ना नहीं चाहती थी और आकाश बार-बार जॉब छोड़ने की बात कहता था। उसने कहा कि जब मैं अच्छा कमा रहा हूँ कि आराम से हमारी ज़िंदगी गुज़र सकती है, तो फिर तुम्हें जॉब करने की क्या ज़रूरत है? मेरे माता-पिता भी नहीं चाहते कि उनकी बहू काम करे।

अपने प्यार को पाने के लिए उर्मि को यह बलिदान देना ही पड़ा। उसने जॉब छोड़ दी और आकाश के साथ परिणय बंधन में बँध गई। फिर तो घर-गृहस्थी में ऐसी उलझी कि दिन, महीने, साल गुज़रते चले गए। आकाश अपनी जॉब में ऊँचाइयों के सोपान चढ़ता गया। फ़्लैट ने डुप्लेक्स का और डुप्लेक्स ने बँगले का रूप ले लिया। दोनों बेटे मेहुल और केतन को उन्होंने हॉस्टल भेज दिया था और वह स्वयं आकाश के साथ मिलकर स्टेटस मेंटेन करने में व्यस्त होती चली गई। किटी पार्टी, मौज-मस्ती, सामाजिक कार्य, यार-दोस्तों के साथ डिनर, पिकनिक, टूर… इन सभी के बीच अपने पैरों पर खड़े होने का सपना सँजोए दिन-रात एक कर पढ़ाई करने वाली उर्मि तो कब की विदा ले चुकी थी। अब थी तो केवल मिसेज उर्मि आकाश सक्सेना, जिसकी अपनी कोई अलग पहचान नहीं थी।

आकाश की दिनचर्या भी इतनी व्यस्त थी कि उसके पास कभी-कभी तो ख़ुद के लिए भी वक़्त निकालना मुश्किल हो जाता था, तो वह उर्मि को कहाँ से वक़्त देता? ऐसे में दोनों के बीच एक ख़ामोशी का रिश्ता बनता चला जा रहा था। उर्मि ने स्वयं को पार्टियों में व्यस्त कर लिया तो आकाश ने काम में। दोनों के बीच की बातचीत में ख़ालीपन भरने का काम घर के नौकरों ने भी किया। घर के हर छोटे-मोटे काम के लिए नौकर थे, तो बहुत से काम तो उनको आदेश देने पर ही हो जाया करते थे, तो एक-दूसरे से बातचीत का सिलसिला भी टूटने लगा था। हालाँकि यह बदलाव एकाएक नहीं आया, पर जब इसे अनुभव किया तब तक ख़ामोशी की दीवार काफ़ी ऊँची हो चुकी थी। कमरा एक था, बिस्तर एक था, पर रिश्ता? वह तो केवल अलार्म घड़ी के साथ उठने और कार से जाते वक़्त हाथ हिलाने तक का ही रह गया था। हँसी, मुस्कान में बदली और मुस्कान इतनी सिमट गई कि अब तो होठों के फैलने पर भी आह निकल आती थी।

दोनों को एक-दूसरे से शिकायत कुछ भी नहीं थी। शिकायत करने के लिए समय भी तो चाहिए। वही तो नहीं था, दोनों के पास। दोनों अपनी-अपनी व्यस्तता में जी रहे थे, पर पिछले कुछ दिनों से उर्मि को ये दिनचर्या, ये मशीनी ज़िंदगी या कह लें कि बनावटीपन खलने लगा था। वह उसी आकाश को खोज रही थी, जिसकी जीवनसंगिनी बनकर वो आई थी।

आकाश की इस व्यस्त दिनचर्या के लिए केवल अकेला आकाश ही ज़िम्मेदार नहीं था। वो स्वयं भी तो ज़िम्मेदार थी। उसने भी अपनी महात्वाकांक्षाओं की हद नहीं बनाई। आकाश की महात्वाकांक्षा के साथ उसे जोड़कर उसे और ऊँचाई दे दी। आकाश ने तो केवल उसे पूरा करने का ही प्रयास किया। आज आकाश की इस व्यस्तता के लिए वो ख़ुद भी तो ज़िम्मेदार है। आकाश का देर रात तक काम में उलझे रहना, कभी क्लब से देर रात घर लौटना तो कभी बॉस के साथ ऑफ़िस में देर तक बैठना, ऐसी तमाम बातों के लिए कहीं न कहीं वो भी तो ज़िम्मेदार है।

क्या इसका हल कुछ नहीं? है क्यों नहीं, ज़रूर है। यदि इसके लिए वो ज़िम्मेदार है, तो इस ज़िम्मेदारी को स्वीकारते हुए उसे बदलाव के लिए भी स्वयं ही प्रयास करना होगा। उसने देखा कि पार्क में उसकी उम्र के लोग तो बहुत कम ही दिखाई दे रहे हैं। यानी 40 से 50 की उम्र के लोग तो बहुत ही कम हैं। पार्क पूरा नन्हे बच्चों से और बुज़ुर्गों से भरा है। आज की परिपक्व पीढ़ी और युवा पीढ़ी या तो देर रात तक जागकर अपना काम करती है या मनोरंजन करती है। जब देर रात तक जागेगी, तो सुबह जल्दी कैसे उठ पाएगी? उनकी ये दिनचर्या उन्हें महात्वाकांक्षा का सागर पार करने के लिए जुनूनी हद तक इस तरह प्रभावित कर रही है कि वे अपने स्वास्थ्य को लेकर बिलकुल भी चिंतित नहीं हैं।

आकाश भी तो इसी परिपक्व पीढ़ी का है, जो अपने स्वास्थ्य की चिंता न करते हुए केवल काम के प्रति समर्पित है। उर्मि को स्वयं ही आकाश को समय देना होगा। अपने सपनों की डोर को और ऊँचाई तक न ले जाकर अब ढील देनी होगी। आकाश के साथ मिलकर एक नया सफ़र तय करना होगा। बातों का सफ़र, अपनेपन का सफ़र जो उन दोनों के बीच आए ख़ालीपन को भर दे।

इसी नए संकल्प के साथ उसने सिर ऊपर उठाया, तो देखा कि सूरज की किरणों ने चारों ओर अपना साम्राज्य बिछा लिया है। गुलाबी धूप अब तीखी धूप बनने के लिए आतुर है। वह भी आतुरता के साथ घर की ओर चल पड़ी। अपने आकाश से मिलने। उसकी व्यस्तता में स्वयं को जोड़ने। उसने तय कर लिया कि अगली बार जब वो इस पार्क में आएगी, तो अकेली नहीं, आकाश के साथ होगी।

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