विरासत नहीं, प्यार में हिस्सा दो
अनिकेत सिंह
“मम्मी, आप बड़े भैया को छोड़ दीजिए। आप मेरे साथ चलिए। केयरटेकर रख लेंगे और हम भी साथ रहेंगे, तो आपको किसी बात की चिंता नहीं रहेगी।”
“ठीक है बेटा, लेकिन दो दिन बाद विकास और वंदन के पापा की पंद्रहवीं तिथि है। उस दिन सुबह जल्दी आ जाना, हमें बीस लोगों का भोजन बनाकर एक जगह देना है,” मनीषा ने कहा और टीनी ने हामी भरते हुए रोटियाँ बनानी शुरू कर दीं।
मनीषा एक रिटायर्ड शिक्षिका थीं। स्वभाव से थोड़ी सख़्त और अनुशासनप्रिय। वह इस घर में अकेली रहती थीं। उनके पति सुरेशचंद्र लगभग डेढ़ दशक पहले ही इस दुनिया को छोड़ चुके थे। उनका बड़ा बेटा लंदन में और छोटा बेटा पुणे में अपने परिवार के साथ बस गया था।
मनीषा दोनों बेटों के घर कुछ समय रहने गईं, पर उनके स्वभाव के अनुकूल वातावरण न मिलने से वहाँ टिक नहीं सकीं। बेटों और बहुओं का जीवन-ढंग उन्हें रास नहीं आया। इसलिए उन्होंने अपने ही घर में अकेले, लेकिन स्वाभिमान के साथ रहना चुना। उन्हें अपनी और पति की पेंशन मिलती थी, इसलिए आर्थिक चिंता नहीं थी।
अब उनसे अधिक काम नहीं होता था, इसलिए उन्होंने टीनी को रख लिया था। टीनी पास की झोपड़ियों में रहती थी। वह सुबह आठ बजे आ जाती और रात दस बजे तक उनके यहाँ रहती। खाना, पीना, घर का काम और मनीषा के कहे अनुसार उनकी मदद करना। ख़ाली समय में उन्हें भगवद्गीता पढ़कर सुनाती।
उनका रिश्ता एक तरह से उतार-चढ़ाव भरा, लेकिन बेहद प्यारा था। मनीषा उसे नौकरानी नहीं, बल्कि अपनी बेटी की तरह रखती थीं। टीनी के परिवार को वेतन मिलता था और टीनी को पसंद की चीज़ें, कपड़े और कुछ जेब ख़र्च अलग से मिल जाता था। दोनों ही संतुष्ट थीं।
दो दिन बाद सुबह जब टीनी पहुँची, तो हैरान रह गई। तिथि का दिन होने के बावजूद घर बंद था। आँगन में तुलसी पर दीप नहीं जला था। उसने कई बार घंटी बजाई, पर दरवाज़ा नहीं खुला। वह पड़ोस में जाकर बोली, “जया आंटी, आपने माँजी को देखा है? दरवाज़ा बंद है, कोई खोल नहीं रहा है।”
“मैंने तो नहीं देखा। शायद कहीं गई होंगी। थोड़ी देर में आ जाएँगी। आओ, यहाँ बैठो, आज चाय मेरे साथ पी लो।”
“नहीं आंटी, आज पुण्यतिथि है। उन्होंने मुझे जल्दी आने को कहा था। बीस लोगों का खाना बनाना है। वह ऐसे कहीं नहीं जातीं,” टीनी ने चिंतित स्वर में कहा।
कुछ घरों में पूछने के बाद भी कोई ख़बर नहीं मिली। तभी जया आंटी दौड़ती हुई आईं, “मनीषा का एक्सीडेंट हो गया है! अस्पताल से फोन आया है, चलो जल्दी।”
दोनों तुरंत रिक्शा लेकर अस्पताल पहुँचीं। रिसेप्शन पर टीनी ने पूछा, “साहब, मनीषा कहाँ हैं? उन्हें ज़्यादा चोट तो नहीं आई?”
डॉक्टर ने बताया कि उन्हें ऑपरेशन थिएटर में ले जाया गया है। बाहर दिव्येश मिले। उन्होंने बताया, “एक बाइकवाले ने टक्कर मार दी और भाग गया। दोनों हाथों में चोट आई है।”
क़रीब एक घंटे बाद डॉक्टर बाहर आए। मनीषा बेहोश थीं, दोनों हाथों में प्लास्टर था। डॉक्टर ने छह महीने आराम की सलाह दी। टीनी अस्पताल में ही रुकी। मनीषा दो दिन बाद डिस्चार्ज हुईं, तो वह उन्हें घर ले आई।
उसने दोनों बेटों को ख़बर दी, पर किसी के पास आने का समय नहीं था। बड़े बेटे ने पैसे भेजने और केयरटेकर रखने को कहा। टीनी ने मना कर दिया। छोटा बेटा पंद्रह दिन बाद आया, हालचाल पूछा और चला गया।
टीनी ने सब समझ लिया। वह वहीं उन्हीं के साथ रहने लगी। उसने पूरे मन से मनीषा की सेवा की। धीरे-धीरे छह महीने बीत गए। प्लास्टर उतरा, फिजियोथेरेपी हुई और मनीषा फिर से स्वस्थ हो गईं।
एक दिन टीनी ने कहा, “माँजी, मैं एक दिन घर होकर आ जाऊँ? आठ महीने हो गए।”
“जाना है तो जा, पर अपने घरवालों से कह देना कि अब तू यहीं रहेगी। वह तेरी उम्मीद में न रहें।”
टीनी हैरानी से हँसते हुए बोली, “ठीक है, कह दूँगी।”
वह एक दिन के लिए घर गई और फिर लौट आई। समय बीतता गया। दिवाली आई, दोनों बेटे घर आए। लेकिन इस बार मनीषा में कोई उत्साह नहीं था। दिवाली के बाद विकास ने कहा, “मम्मी, आप मेरे साथ लंदन चलो। वहाँ बेहतर सुविधाएँ हैं।”
“मैं तुम्हारे साथ आ तो जाऊँ, लेकिन तुम्हारी पत्नी को अच्छा लगेगा?” मनीषा ने पूछा।
विकास चुप हो गया। वंदन बोला, “आप मेरे साथ चलो।”
“तुम्हारी पत्नी तो मुझे ही केयरटेकर मानती है, भूल गया?” मनीषा ने कहा, तो वह भी चुप हो गया।
मनीषा ने साफ़ कहा, “मैं कहीं नहीं जाऊँगी। मैं यहीं अपनी टीनी के साथ रहूँगी। और यह घर अब मैं टीनी के नाम कर रही हूँ। मेरे गहने भी उसी के होंगे। बाक़ी पैसा तुम लोग बाँट लेना।”
टीनी तुरंत बोली, “माँजी, ऐसा अन्याय मत कीजिए। मुझे आपकी संपत्ति में हिस्सा नहीं चाहिए। मैंने आपकी सेवा बेटी की तरह की है। मुझे तो बस आपके प्यार में हिस्सा चाहिए, वही काफ़ी है।”
यह सुनकर मनीषा उठीं और टीनी को गले लगा लिया। दोनों की आँखें नम हो गईं।