तब क्या होगा
राहुल देव
जब हम ज़िन्दा रहेंगे
और एक दिन अचानक
बोल तो रहे होंगे
मगर किसी को सुनाई नहीं देगा
तब क्या होगा?
लोग बोल तो रहे होंगे
मगर उनकी बातें सुनाई देने के बजाय
सिर्फ़ कानों में अंतहीन सन्नाटे के सिवाय
कुछ भी नहीं होगा,
तब क्या होगा?
क्या विश्वास है इस मिट्टी के शरीर का
कभी हम अचानक अंधे हो जा
और यह संसार अनंत कालिमा हो जाएँ
तो क्या हम बरदाश्त करने को तैयार हैं
जो अब तक हम सुंदर संसार को देख रहे थे
और आ जाए अचानक परत दर परत अँधेरा
तब क्या होगा?
क्या पता धरती रहे,
ख़त्म हो जाए पानी, हवा,
हमारे दुर्व्यसन से।
और इस ब्रह्मांड से
पूरी तरह से विलुप्त हो जाए ध्वनि
तब हम सब अपना अपना गला पकड़ कर
चिल्लायेंगे मगर कोई नहीं सुन पाएगा
एक दूसरे को
तब क्या होगा?
तब क्या होगा?
जब हम इतने विवश हो जाएँ
और घूम जाए पूरी धरती हमारे सामने
मात्र हम यह सोच पाएँ
क्या आश्रित होना इतना घातक है!
चाहे प्रकृति से या चाहे इस मानव शरीर से
तब क्या होगा?
तब क्या होगा?
यह प्रश्न हमें विस्तारित करता है कि हम
इस निष्कर्ष पर पहुँचे . . .
कि यह सब होने पर
तब क्या होगा?