सर्जक, आलोचक और कोशकार डॉ. मधु संधु—एक विवेचन
डॉ. देवेन्द्र कुमारपुस्तक का नाम: सर्जक, आलोचक और कोशकार डॉ. मधु संधु
संपादक: डॉ. दीप्ति
प्रकाशक: शिवना, सीहोर, एम. पी.
प्रकाशन वर्ष: 2024
मूल्य: 450
भारत के पश्चिमी सीमावर्ती प्रांत पंजाब की पावन भूमि पर जन्म लेकर, इसी भूमि को अपना कार्यस्थल बनाने वाली, लगभग चार दशक हिन्दी साहित्य का कोष अपनी रचनाओं से पूरित करने वाली और 21वीं सदी की 111 हिन्दी लेखिकाओं में स्थान रखने वाली डॉ. मधु संधु निःसंदेह पंजाब की अग्रणी हिन्दी साहित्यकार हैं। कोशकारी जैसे दुर्गम और श्रमसाध्य कार्य को जितनी सहजता से डॉ. मधु संधु ने सम्पन्न किया, वह अन्यत्र दुर्लभ है। लगभग 36 वर्ष लम्बे साहित्यकार जीवन में जितनी भी ज्ञानराशि हिन्दी साहित्य को प्रदान की, उसका समन्वित और सार्थक प्रयास है—डॉ. दीप्ति द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘सर्जक, आलोचक और कोशकार डॉ. मधु संधु’। 37 लेखकों के आलेखों को इस पुस्तक में स्थान मिला है और डॉ. मधु जी के समस्त साहित्य को एक जिल्द में प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत पुस्तक डॉ. मधु संधु के साहित्य को जानने-समझने-परखने में नव-साधकों/अनुसंधित्सुओं को असीम सहयोग प्रदान करेगी, ऐसा मेरा विश्वास है। आलोचना, सर्जना और कोशकारी की जो त्रिवेणी डॉ. संधु ने चार दशकों तक बहाई, उसका संगम है यह पुस्तक।
प्रस्तुत पुस्तक को पाँच भागों (चार खण्डों) में विभक्त किया गया है: संस्मरण, सर्जक (कहानी), काव्य, आलोचक और कोश ग्रंथ। उनके साहित्य के विश्लेषण के 28 आलेखों के साथ 9 आलेख संस्मरणात्मक हैं, जो उनके मित्रों/ हितैषियों द्वारा प्रस्तुत किये गये हैं। प्राक्कथन में डॉ. दीप्ति ने सभी आलेखों का संक्षिप्त परिचय सुरुचिपूर्ण ढंग से दिया है और लेखकों द्वारा दी गई टिप्पणियाँ और स्थापनाएँ यथास्थान प्रस्तुत की हैं। देशी-विदेशी/प्रवासी साहित्यकारों ने अत्यंत मनोयोग से उनके साहित्य की समीक्षा की है। डॉ. दीति की कर्मठता, निरंतर संलग्नता और अथक परिश्रम पुस्तक के रूपाकार में दिखाई देता है, अतः वे बधाई की पात्रा हैं।
खण्ड-एक (संस्मरण) में 9 साहित्यकारों के संस्मरण हैं। साहित्यकुंज डॉट नेट के संस्थापक सुमन कुमार घई ‘डॉ. मधु संधु का साहित्यः एक प्रवासी का दृष्टिकोण’ संस्मरण में 2003 में साहित्यकुंज की स्थापना अर्थात् इंटरनेट पर हिन्दी साहित्य के आरंभिक दिनों में डॉ. मधु जी की इंटरनेट और आई.टी. क्रांति की समझ और समय के साथ चलकर इंटरनेट की उपयोगिता को समझने-अपनाने की याद ताज़ा कर रहे हैं। उस समय जबकि पुरुष साहित्यकार भी (कम से कम पंजाब में) इंटरनेट को अपनाने में हिचकिचा रहे थे, डॉ. मधु जी इंटरनेट और आई.टी. क्रांति को अपनाकर निरंतर साहित्य कर्म सफलतापूर्वक जारी रखा। उनकी पुस्तक-समीक्षाओं की चर्चा करते घई जी लिखते हैं, “इतने प्रवासी लेखकों की पुस्तकों की समीक्षा करने वाली डॉ. मधु संधु ही संभवतः अकेली साहित्यकार हों।” प्रवासी साहित्य पर लेखनी चलाने वाली उस समय संभवतः वे पंजाब की इकलौती साहित्यकार हैं।
‘डॉ. मधु संधु का रचना संसार’ में रवि रतलामी भी डॉ. मधु द्वारा साहित्य-लेखन में नवीनतम तकनीक के उपयोग करने वालों में अग्रणी मानकर उनकी मुक्त कण्ठ से प्रशंसा करते हैं। वे डॉ. मधु की रचनाओं और समीक्षाओं का आकलन करते हुए उनकी पारदर्शी आलोचना-दृष्टि और सशक्त मूल्यांकन करने के रचनात्मक सामर्थ्य की भरपूर प्रशंसा करते हैं। उनकी कहानी ‘इमटेलेक्चुअल’ में प्रस्तुत व्यंग्य हो, ‘मेरी दुबई यात्रा’ की साहित्यिक सचित्र शैली हो, ‘तलवार की धार बनाम महिला साहित्यकार’ में समाज की विद्रूपता पर करारा व्यंग्य हो या ‘जियो पुराण’ में नवीनतम तकनीक और समाज को जकड़ लेने का मायाजाल हो, सभी क्षेत्रों में उनका कोई सानी नहीं है।
दीपक शर्मा अपने संस्मरण ‘डॉ. मधु संधु—एक मुखर रचनाकार/आलोचक’ में उनकी रचना ‘कहानी का समाज-शास्त्र’ से आरंभ करके उनकी निर्मल वर्मा, साठोतरी महिला कहानीकार आदि पुस्तकों पर दृष्टि डालते हुए उनकी महिला उपन्यासकारों और देशी-प्रवासी महिला कहानीकारों के विवेचन/मूल्यांकन में उनकी पैनी आलोचना-दृष्टि की श्लाघा करती हैं। स्त्री-लेखन के सम्बन्ध में उनकी भाषा की प्रशंसा करते वे फ्रांसीसी विचारक हेलन सिक्सू, अमरीकी कवयित्री औड्रे लौर्ड, अमरीकन नारीवादी बैटी फ्रीडेन इत्यादि की सूक्तियों का दृष्टांत देते हुए डॉ. मधु की ‘स्त्री भाषा’ को साधुवाद देती हैं।
‘डॉ. मधु संधुः उत्कृष्ट रचनाकार और समालोचक’ में विख्यात प्रवासी लेखिका और डेनमार्क की शिक्षिका अर्चना पेन्यूली अपने और डॉ. मधु के प्राथमिक परिचय से आरंभ करते हुए परस्पर मधुर सम्बंधों का ज़िक्र भी करती हैं और उनकी रचनाओं के औदात्य की चर्चा भी करती हैं। कथा-साहित्य के मोह जाल में बँधी डॉ. मधु जी के समस्त साहित्य पर वे संक्षिप्त परिचयात्मक टिप्पणी करती हैं। अर्चना जी के अनुसार डॉ. मधु प्रवासी हिन्दी साहित्य को लेकर विस्तार से लेखनी चलाने और अत्यंत धैर्य के साथ कृतियों का विश्लेषण करने वाली चंद साहित्यकारों में विशेष स्थान रखती हैं। अपनी प्रत्येक कृति पर डॉ. मधु की समीक्षाओं के कारण वे उनका आभार करती हैं और साहित्य को नवीन अर्थ और गति प्रदान करने के लिए वे डॉ. मधु को नमन करती हैं।
‘रिश्तों की गहराइयों को उभारती रचनाएँ’ टोरोंटो विश्वविद्यालय की डॉ. हंसा दीप का संस्मरणात्मक आलेख है। एक मित्र के माध्यम से वे डॉ. मधु से परिचित होतीं हैं और यह परिचय आत्मीयता में परिणत हो जाता है। डॉ. मधु उनके ‘बंद मुट्ठी’, ‘कुबेर’ और ‘केसरिया बालम’ पर लिखती हैं, जिससे उनकी लेखनी को नये आयाम मिलते हैं। डॉ. हंसा दीप उनके अद्भुत व्यक्तित्व, अद्वितीय रचनात्मकता और प्रखर आलोचना दृष्टि की क़ायल हैं। डॉ. हंसा उनके रचनाकर्म की श्लाघा करते हुए उनकी रचनाओं और आलोचनाओं का उल्लेख करती हुईं उनके सामाजिक सरोकारों की बात करती हैं। सामान्य सी घटना को लेकर सुगठित ताना-बाना बुन लेना और कम शब्दों में गहरी बात कह देना डॉ. मधु जी की विशिष्टता है। डॉ. हंसा उनकी कहानियों और लघुकथाओं के कथ्य को खोलती हुईं उनके भाव-सौंदर्य को रेखांकित करती हैं। डॉ. मधु की रचनाएँ उनके भीतर की संघर्षमयी भावनाओं और अनुभूतियों को तीव्रता से अभिलक्षित करती हैं।
‘यादों का सफर’ डॉ. चंचल बाला का समीक्षात्मक संस्मरण है। उसमें वे डॉ. मधु के रचनाकर्म को परत-दर-परत खोलते हुए उनकी लेखनी का अत्यंत सटीक और भावपूर्ण विश्लेषण करती हैं। “डॉ. मधु संधु उस शख़्सियत का नाम है, जो ख़ुद के लिए न सोचकर दूसरों के लिए रंग भरे फूल बाँटती रहती है। बेरौनक चेहरों की उदासी को हँसी में बदलने का हुनर उनके पास क़ुदरती है।”(पृष्ठ 36) ऐसी स्थापना है जिसमें रत्ती भर भी असत्य नहीं है। डॉ. मधु को जानने-समझने के लिए व्यक्तिगत सम्पर्क से ज़्यादा उनकी रचनाओं को समझना होगा। लेखन में वे भावुक हैं परन्तु यही भावुकता उनकी शक्ति भी है और कमज़ोरी भी। उनका लेखन अनवरत है, समय साध्य है, श्रम साध्य है। प्रवासी साहित्य लेखन में तो उनकी विलक्षण पहचान है ही।
‘तन वासी मन प्रवासीः रचना धर्मिता—प्रो. मधु संधु’ डॉ. किरण खन्ना का समीक्षात्मक संस्मरण है, जिसमें उनकी रचना धर्मिता पर विचार प्रस्तुत किये गये हैं। प्रवासी साहित्य विशेषतः प्रवासी महिलाओं द्वारा रचित साहित्य का आकलन/आलोचन उनकी विशेष उपलब्धि और पहचान है। तन से भारतवासी होकर भी मन से वे प्रवासी हैं और प्रवासी साहित्य की समीक्षा करते करते वे अपनी भूमि से उखड़े प्रवासी साहित्यकारों की चिन्तन यात्रा की सहयात्री भी बनती हैं।
डॉ. अनुराधा शर्मा का ‘स्वर्णिम पलों का आकलन’ संस्मरण एक शिष्या द्वारा अपनी गुरु के सान्निध्य में बिताए पलों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करता है। विभाग में प्रवेश करते हुए उनकी रोज़ाना की वेशभूषा से लेकर बोल-चाल तक का विवरण यहाँ मिल जाएगा। डॉ. अनुराधा ने डॉ. मधु की प्रत्येक विशिष्टता—चाहे उनका व्यक्तित्व हो, लेखन हो, अध्यापन हो, एक पत्नी/माँ का रूप हो, सभी का सटीक विश्लेषण किया है। उन्होंने लिव-इन रिलेशन और बाज़ारवाद का जितना सटीक और सूक्ष्म विश्लेषण किया है, वैसा अन्यत्र मिलना दुर्लभ है। वे नवीन जीवन मूल्यों के प्रति सजग हैं और उनको साहित्यिक विकास के साथ जोड़ती भी हैं।
‘जमीन से जुड़ा व्यक्तित्व—डॉ. मधु संधु’ डॉ. ज्योति ठाकुर का संस्मरण है, जिसमें वे अपनी मधुर स्मृतियों को सबके साथ साझा करना चाहती हैं। आशा-निराशा, जय-पराजय, सुख-दुःख के अनेक क्षणों में भी डॉ. मधु की अडिग आस्था और आत्मविश्वास उनके व्यक्तित्व को किसी और ही मुक़ाम पर ले जाता है, जहाँ वे सबके लिए पथ-दर्शिका का दायित्व उठाती नज़र आती हैं। सोशल-मीडिया के चलन और सुप्रभात के संदेशों की बाढ़ में उनका कविता के रूप में उत्तर देना उनकी काव्यात्मकता, रचनात्मकता और सूक्ष्म लेखकीय दृष्टिकोण का जीवंत उदाहरण है। संवेदनशील लेखक ऐसे ही होते हैं और विशिष्ट लेखकों की संवेदना भी ऐसी ही होती है।
‘खण्ड दो-सर्जक’ दो उपखण्डों में विभक्त है। उपखण्ड-क (कहानी) में 12 आलेख और उपखण्ड-ख (काव्य) में 10 आलेख हैं। सभी आलेख उत्तम हैं और डॉ. मधु संधु की रचनाओं का विविधमुखी विश्लेषण करने में सक्षम-सार्थक हैं। कहानी उपखण्ड में 12 लेखकों ने डॉ. मधु की कहानियों/लघुकथाओं को विभिन्न दृष्टिकोणों से विश्लेषित किया है। कहीं सामाजिक सरोकार हैं तो कहीं नारीवादी दृष्टिकोण, कहीं अंतरपाठीयता है तो कहीं शैलीवैज्ञानिक विश्लेषण, कहीं वर्तमान समाज है तो कहीं नागर जीवन और जीवन मूल्य। सभी आलेख उत्तम हैं और सार्थक भी।
‘साँसों की जीवित कहानियां’ प्रो. मोहनकांत गौतम का एक लघु आलेख है परन्तु विश्लेषण अत्यंत गहन है। ‘कहानी का समाजशास्त्र’ की चर्चा करते वे लिखते हैं कि समाज के अभाव में कोई भी कहानी अथवा काव्य नहीं लिखा जा सकता। वस्तुतः कहानी की भी अपनी साँसें होती हैं और साँस लेने से ही मस्तिष्क में विचार आते हैं। डॉ. गौतम एक-एक पंक्ति में डॉ. मधु की एक-एक कहानी का विवेचन करते हुए मानों साँस-साँस का विश्लेषण करते हैं।
‘दीपावली@ अस्पताल.कॉम के सन्दर्भ में डॉ. मधु संधु का कहानी-संसार’ में डॉ. देवेन्द्र कुमार उनकी कहानियों में सामाजिक सरोकारों को रेखांकित करने का प्रयास करते हैं। डॉ. मधु जी की ‘कुमारिका गृह’ में प्रौढ़ाओं का नया जीवन शुरू करना हो अथवा ‘आवाज का जादूगर’ में नमन की माँ की मृत्यु के उपरांत घर के सभी कामों के लिए पुनः विवाह करके निःशुल्क घर की फाइनेंसर का प्रबन्ध करना हो, ‘सनराइज इंडस्ट्री’ में लेस्बियन्स विद्या और बीना का भिन्न समाज और भिन्न मनोवृति हो अथवा ‘लिव इन’ के पात्रों का गृहस्थ जीवन की पुरातन धारणा को बदलने का प्रयास हो, सभी परिस्थितियों को अत्यंत कलात्मकता से चित्रित किया गया है। विश्वविद्यालयों में होने वाली धांधलियों को बेनक़ाब करने वाली उनकी ‘इंटेलैक्चुएल’, ‘संगोष्ठी’, ‘ग्रांट’, ‘अवार्ड’, ‘शोधतंत्र’ इत्यादि कहानियों में वरिष्ठ आचार्यों के कुत्सित और काले कारनामों का श्वेत-पत्र प्रस्तुत किया गया है।
‘डॉ. मधु संधु की लघुकथाओं में स्त्री पात्रों की सामाजिक विडम्बनाओं के सरोकार’ आलेख में डॉ. नितीन उपाध्ये डॉ. मधु की लघुकथाओं में सामाजिक विडम्बनाओं को खोजने/परखने का सफल प्रयास करते हैं। जिस देश में कभी स्त्री जाति का सम्मान सर्वोपरि होता था, उसी देश में स्त्री को अबला बना दिया गया। अपने साहित्य के माध्यम से स्त्री को अबला से सबला बनाने/चित्रित करने का सद्प्रयास डॉ. मधु संधु जैसी प्रबुद्ध लेखिकाओं ने सफलतापूर्वक किया। डॉ. मधु की लघुकथाओं की नायिकाओं के अपने-अपने रूल्ज़, अपने-अपने क़ायदे हैं। समाज के विभिन्न वर्गों की स्त्रियों के विभिन्न अंदाज़ पाठकों को नये समाज की नई महिलाओं के रंग-ढंग से वाक़िफ़ भी करवाते हैं और हैरान भी करते हैं। समाज के सकारात्मक-नकारात्मक बदलाव उनकी लघुकथाओं में दिखाई दे ही जाते हैं।
‘डॉ. मधु संधु की कहानियों में स्त्री-चेतना’ डॉ. सृजना बेदी का आलेख है। उनके अनुसार डॉ. मधु बिना किसी वाद या ख़ेमे के चक्र में पड़े चेतना के स्तर पर अपनी कहानियों में स्त्रियों की वकालत करती हैं। उन्होंने स्वानुभूत वेदनाओं-संवेदनाओं, जीवनानुभवों को बिना किसी लाग-लपेट के अपनी रचनाओं में व्यक्त किया। ‘जीवनघाती’ की नायिका पुरुष के प्रत्येक षड़यंत्र अथवा चुनौती का सामना करने और निर्भयता से आगे बढ़ने में सबल-समर्थ है। ‘कुमारिका गृह’ में समाज की अधकचरी मान्यताओं के विरोध में प्रौढ़ाओं का शंखनाद उन्हें अलग ही स्तर प्रदान करता है। ‘आवाज़ का जादूगर’ में मानवीय मूल्यों और नैतिकता की मृत्यु दिखाई गई है। ‘बीजी’, ‘इमेज’, ‘बेचारा अलादीन’ आदि कहानियों में नीति-विहीन राजनैतिक अव्यवस्था को दिखाया गया है। ‘अवार्ड’, ‘शोधतंत्र’ आदि कहानियों में विश्वविद्यालयों के लालची और तिकड़मबाज़ आचार्यों के काले कारनामें प्रस्तुत किये गये हैं।
‘नागर जीवन के संश्लिष्ट चित्रण की कहानियां’ में सुजाता जी. नायक डॉ. मधु संधु द्वारा समाज में व्याप्त सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक विपदाओं को हटाकर समाज को सही दिशा में ले जाने के सद्प्रयास की प्रशंसा करी हैं। उनकी कहानियों में नागर जीवन की समस्याओं से अवगत कराने के साथ-साथ उसमें नव चेतना का संचार भी दिखाई देता है। पग-पग पर समझौता करना नागर लोगों की त्रासदी है और नागर नारी तो जीवन की जटिलताओं-संघर्षों से कभी भी मुक्त नहीं होती। स्वार्थ-प्रियता वर्तमान पीढ़ी का हुनर बन चुका है। डॉ. मधु ने अपनी कहानियों में नागर जीवन की प्रत्येक स्थिति, संस्या, सम्बन्ध और नारी जीवन के प्रत्येक पहलू का सूक्ष्म चित्रण किया है।
डॉ. रश्मि शर्मा ने ‘अंतरपाठीयताः सिद्धांत एवं अनुप्रयोग (दीपावली@अस्पताल.कॉम का संदर्भ)’ में उत्तर संरचनावादी अवधारणा की कसौटी पर डॉ. मधु की कहानियों को कस कर जाँचा-परखा है। पुनर्कथनमूलक, अनुकूलनमूलक, विद्रूपिकामूलक, संशोधनमूलक आदि अंतरपाठी टूल्ज़ के अंतर्गत उनकी कहानियों का विश्लेषण किया गया है। उनकी कहानियों में स्थान-स्थान पर फ़िल्मी गीतों, व्हाट्सऐप संदेशों, साहित्यिक उद्धरणों के रूप में पुनर्कथनमूलक अंतरपाठीयता के दर्शन होते हैं। कहानियों में उपलब्ध अंतरपाठीयता के स्थलों को सूक्ष्मता से जाँच-परख कर विश्लेषित किया गया है।
डॉ. सरोज बाला ने ‘डॉ. मधु संधु कृत कहानी-संग्रह दीपावली@अस्पताल.कॉम की चयनित कहानियों का शैलीवैज्ञानिक विश्लेषण’ में तीन कहानियों (कुमारिका गृह, दीपावली@अस्पताल.कॉम और आवाज़ का जादूगर) का शैलीवैज्ञानिक विश्लेषण किया है। शैलीविज्ञान के प्रमुख प्रतिमान अग्रप्रस्तुति के आधार पर इन कहानियों को विचलन, विपथन, समांतरता और विरलता अभिलक्षणों की कसौटी पर कस कर देखा गया है। अग्रप्रस्तुति प्रतिमान के आधार पर रचना की परख करते हुए किसी भी प्रकार का संक्षिप्तीकरण आथवा सांकेतिक विश्लेषण सभव नहीं होता, अतः आलेख लम्बा है परन्तु सार्थक है।
‘डॉ. मधु संधु की कहानियों में स्त्री-विमर्श’ में डॉ. महक ने उनकी कहानियों में स्त्री-विमर्श आथवा नारीवादी चेतना को केन्द्रबिन्दु में रखा है। डॉ. मधु की नायिकाएँ सदैव पिता, पति और पुत्र के अधीन रहने वाली व्यवस्था के विरोध में जाकर समाज में नई ऊर्जा, नये मूल्यों का संचार करती हैं। डॉ. महक ने उनकी कहानियों में स्त्रियों की विभिन्न समस्याओं, संघर्षों और अनचाही कशमकश का रेखांकन किया है। वस्तुतः नारी की अधिकांश समस्याओं की जड़ पुरुष न होकर कोई अन्य औरत ही है। डॉ. मधु की कहानियों के नारी पात्र समाज की प्रत्येक परिस्थिति से प्रभावित होने के साथ-साथ समाज को भीतर तक प्रभावित भी करते हैं।
‘डॉ. मधु संधु की कहानियों में आधुनिक नारी के जीवन मूल्य’ आलेख में डॉ. शैलजा सैली ने उनकी कहानियों में व्याप्त आधुनिक नारी द्वारा मान्य/स्वीकृत मूल्यों पर प्रकाश डाला है। विभिन्न परिस्थितियों में उनकी नायिकाएँ आधुनिकता से होड़ लेती हुई अपने लिए नये मूल्यों का निर्माण करती है तो आवश्यकतानुसार कतिपय मूल्यों में आमूल-चूल परिवर्तन/परिवर्धन भी करती परिलक्षित होती हैं और यही इन कहानियों का मज़बूत पक्ष भी है। उनकी नायिकाओं के लिए उन्मुक्त होकर उड़ने के लिए मुक्त आकाश उपलब्ध है।
सरिता देवी ने ‘दीपावली@अस्पताल.कॉम की लघुकथाओं में चित्रित समाज’ आलेख में डॉ. मधु संधु जी की लघुकथाओं को विवेचन का विषय बनाया है और बदलते समाज के अनुरूप मनुष्य को बदलते हुए दिखाया है। वर्तमान समाज का यथार्थ चित्रण करते हुए उन्होंने मनुष्य को जागरूक करने का सद्प्रयास किया है। समाज के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डालते हुए सरिता देवी ने डॉ. मधु की लघुकथाओं के कथ्य को बख़ूबी विश्लेषित किया है। ‘देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर’ की तर्ज़ पर ये लघुकथाएँ अपने लघु कलेवर में भी समाज के गंभीर मसलों को उठाने/सुलझाने का प्रयास करती दृष्टिगत होती हैं।
‘दीपावली@ अस्पताल.कॉम की लघुकथाओं में सामाजिक सरोकार’ में शोधार्थी पूजा ने डॉ. मधु जी की लघुकथाओं में से समाज के विभिन्न पक्षों पर प्रकाश डाला है। प्रस्तुत आलेख में विविध समाज-सापेक्ष मूल्यों का विवेचन किया गया है। कैसी परिस्थिति में मनुष्य कैसा व्यवहार करता है, वह इन लघुकथाओं में सटीकता से चित्रित किया गया है। डॉ. मधु तीव्र, आकस्मिक परन्तु सूक्ष्म पहलुओं को पाठकों के समक्ष अपनी लघुकथाओं के माध्यम से प्रस्तुत करती हैं। ये लघुकथाएँ काल्पनिक न होकर यथार्थ की क्रूर भूमि पर जीवंत होती हुईं समाज को वास्तविक्ता से रू-ब-रू करवाती हैं।
इस उपभाग का अंतिम आलेख ‘दीपावली@अस्पताल.कॉमः वर्तमान समाज का चित्रांकन’ है जिसमें शोधार्थी ज्योति ने संग्रह की लघुकथाओं में वर्तमान समाज का चित्रण करने का प्रयास किया है। इन लघुकथाओं में व्यक्ति, राजनीति, साहित्य जगत्, शिक्षा जगत्, घर-परिवार आदि में व्याप्त कतिपय मूल्यों/वर्जनाओं को अत्यंत सतर्कता के साथ प्रस्तुत किया गया है और साहित्य को सही अर्थों में समाज का आईना सिद्ध किया है।
खंड दो ‘सतरंगे स्वप्नों के शिखर और संकल्प सुख’ दो काव्य-संग्रहों में लगभग दस के क़रीब विभिन्न आलेखों पर लेखकों ने अपने-अपने विचारों का एक अध्ययन प्रस्तुत किया है। डॉ. मधु संधु के काव्य-संग्रहों में स्त्री विमर्श, रिश्तों की गहराइयों की उभारती कविताएँ, प्रकृति, उत्सव, त्योहार, पर्यावरण आदि जीवन के हर रंगों का वर्णन बहुत ख़ूबी से किया गया है, जो पाठक के हदय की गहराइयों में प्रवेश होकर अंतर्मन को झकझोरने लगता है।
प्रथम आलेख में पूर्णिमा वर्मन, ‘डॉ. मधु संधु की प्रकृति और उत्सव संबंधी कविताएं—एक अध्ययन’ में त्योहारों, ॠतुओं, नदियों और वृक्षों आदि के मनोरम दृश्यों को दर्शाया गया है। ‘लोकतंत्र का महापर्व’ में नेताओं के झूठे वादे, उनकी सत्ता लोलुपता, एक नेता का दूसरे नेता पर कीचड़ उछालना, ‘मकर संक्राति’ कविता में गीति शैली में पतंग को विषय बनाया गया है। पतंग आसमान में नहीं मोबाइल में उड़ाई जाती है। ‘ग्रीष्म’ कविता धूप से सीधा वार्तालाप शैली में लिखी गई है। धूप को जीवनदात्री मानते हुए सृष्टि का हिस्सा बताया गया है। ‘विपाशा’ नदी शिवालिक की पहाड़ियों से निकलती हुई हिमाचल की यात्रा करते हुए पंजाब तक आती है। व्यास नदी ऋग्वेद, वृहद्देवता और महाभारत काल में सबसे प्रमुख नदियों में से थी। आज नदियों का पानी दुर्गन्धित, दुर्बल और दूषित हो रहा है। देश की नदियाँ रुग्ण होकर मर रही है। संग्रह की प्रत्येक कविता कोई न कोई संदेश देती है।
डॉ. विवेक मणि त्रिपाठी का “संकल्प सुख: मूल्याकन” में सनातन परिवेश में नवीन सोच को उद्घाटित एवं स्थापित करने का सफल प्रयास किया है। डॉ. मधु संधु संकल्प सुख काव्य-संग्रह में प्रश्न उठाती हुई कहती है कि सर्वस्व अर्पण के बावजूद भी बेबस नारी शोषित एवं अपमानित क्यों? करवाचौथ, पुत्रदा एकादशी, जिउतिया आदि निर्जला व्रतों की अविच्छिन्न शृंखला नारी के लिए ही क्यों? पत्थर होने का दण्ड बलत्कृत अहिल्या को ही क्यों? धर्मराज की उपस्थिति में द्रौपदी का चीरहरण क्यों? श्रीकृष्ण की अनेक रानियों के मध्य राधा विरहिणी क्यों? सीता, राधा, द्रौपदी, अहिल्या एवं मीरा के साथ जो अन्याय हुआ उसके लिए दण्ड विधान क्यों नहीं? काव्य संग्रह में उठाए गए सभी प्रश्न पाठकों के हदय को द्रवीभूत करते है।
चित्रा सिंह का ‘डॉ. मधु संधु के काव्य में सौदर्य और प्रेम’ में मानवीय जीवन और उसके अंतर्सम्बंधों का गहन विश्लेषण किया गया है। सौंदर्य और प्रेम मानवीय समाज की सर्वोत्तम निधि है। जहाँ प्रेम का वास होता है वहाँ सौंदर्य स्वतः दिखाई देता है। ‘स्त्री-पुरुष’ कविता में सहयोग भाव, परस्पर संबंधों, एक दूसरे के पूरक दर्शाया गया है। ‘बेटियाँ’ कविता वात्सल्य की दृष्टि से अद्वितीय है। ‘तुम और मैं’ कविता में स्त्री पुरुष के प्रति त्याग, बलिदान और समर्पण भाव प्रदान करती है। कवयित्री कहती है कि स्त्री मानवीय समाज की बहुआयामी संरचना की सबसे विशिष्ट व दिव्य अनुभूति है। वह स्त्री होने के साथ एक मनुष्य भी है।
श्रीमती पवन कुमारी का ‘डॉ. मधु संधु के काव्य में स्त्री विमर्श’ में स्त्री के जीवन की अनगिनत समस्याओं को चित्रित करने का प्रयास किया गया है। रूढ़िगत परंपराओं एवं मान्यताओं के प्रति असंतोष व उससे मुक्ति का स्वर ही स्त्री विमर्श है। नारी को हर क्षण अग्निपरीक्षा से गुज़रना पड़ता है। उसे अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए संघर्ष करना पड़ता है। घर की रक्षा, सुरक्षा, ज़रूरत, मान सम्मान सब उसकी साधना है।
खंड तीन ‘आलोचक’ में डॉ. तरसेम गुजराल का ‘हिन्दी कथा लेखन में महिलाओं का अद्भुत योगदान’ आलेख में भारतीय महिला लेखन और प्रवासी महिला लेखन दोनों को साथ लिया गया है। इस आलेख में विभिन्न लेखिकाओं के उपन्यासों और कहानियों के बारे में बताया गया है। लेखिका कहती है कि “भारत में जाति प्रथा का बोलबाला है और विदेश में नसलवाद का। दोनों ही व्यक्ति को व्यक्ति से दूर करते है, कुंठित और एकांगी बनाते हैं, मनुष्य और मनुष्य के बीच दीवार खींचते हैं। दोनों ही मानवता विरोधी हैं। भारतीय कथाकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर जाति भेद का अंकन किया है तो प्रवासी कथाकारों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नसलवाद को चित्रित किया है।”
स्मिता रजक का ‘डॉ. मधु संधु जी की आलोचना में निहित गहराई की झलकियां’ में कई चौंका देने बिंदु उभर कर हमारे सामने आते है। संधु जी की पुस्तक ‘महिला उपन्यासकार’ एक अद्भुत आलोचनात्मक कृति है। आज की स्त्री नए नाम और नयी पहचान से जानी जाती है। पहले वह स्वकीया, परकीया, वेश्या, मुग्धा, प्रौढ़ा, प्रोषितपतिका आदि नामों से जानी जाती थी किन्तु आज नहीं। उसके सामने पहचान का नया खुला आकाश है। आत्मविश्वास की बढ़ती लहर ने, शैक्षिक ऊँचाइयों ने, आर्थिक आत्मनिर्भरता ने, वैज्ञानिक उपलब्धियों ने, इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने, नवीन नैतिकताओं ने, ईश्वरीय अस्तित्व की नव व्याख्या ने इसे एक नई दुनिया की खोज की महाशक्ति दी है।
डॉ. कंचन गोयल का ‘रचनाप्रकिया और आलोचक (महिला उपन्यासकार: 21वीं शती की पूर्व संध्या के संदर्भ में)’ में आठ महिला श्रेष्ठ उपन्यासकारों के नौ उपन्यासों को आलोचक और रचनाकार दोनों के नज़रिए से पाठक के समक्ष प्रस्तुत किया है। डॉ. मधु संधु ने अपनी बौद्धिक कुशलता से आठ महिला उपन्यासकारों के विचारों को अपनी पुस्तक महिला उपन्यासकार में लेकर गागर में सागर भर दिया है।
डॉ. प्रशांत कुमार के आलेख ‘डॉ. मधु संधु की कविता में स्त्री विमर्श” में स्त्रियाँ भविष्य के दुर्ग द्वार पर दस्तक देती हुई जीवन के प्रशस्त पथ पर सीना तान बढ़ रही है। डॉ. मधु संधु की कविताओं का अपना एक अलग स्वर है। उन्होंने अपनी क़लम से विश्व पटल पर स्त्री-केन्द्रित समस्याओं के ज्वलंत मुद्दों समाज के समक्ष रू-ब-रू किया है। कन्या भ्रूण हत्या से संबंधित अमानवीयता, क्रूरता और अनैतिकता की स्थिति हमें आत्ममंथन व चिंतन करने के लिए मजबूर कर देती है। स्त्री विमर्श को रेखांकित करने वाली कविताएँ हमारी न्याय व्यवस्था और धर्म के गाल पर तमाचा है। आज की स्त्री अपनी छवि बदल रही है। आत्मनिर्भर बन रही है और पितृसत्तात्मक दीवार को ढाह कर अपने लिए नयी इबारत रच रही है। कवयित्री अपनी कविताओं की कोमल शब्दावली से कविता के मर्म को उद्घाटित करने की क्षमता रखती है।
सूर्यकांत सुतार ‘सूर्या’ का ‘सतरंगे स्वप्नों के शिखर: मूल्याकन’ में ज़िन्दगी के बहुत सारे रंग छिपे हुए हैं। उनकी कविताओं में सावित्री से लेकर राधा और गौतम के शाप का शिकार अहिल्या का ज़िक्र मिलता है। पर्यावरण से प्रेम और दूषित वातावरण के प्रति चिंता को भी प्रकट किया गया है। कवयित्री सपनों और आज़ादी के साथ-साथ समाज में फैली बुराइयों पर कड़ा प्रहार किया है। कवयित्री की कविताएँ मातृप्रेम से भरी हुई है। माँ-बेटी के रिश्ते को लेकर उनका मातृव्य असंख्य रूपों में विस्तार लेता है।
डॉ. तेजिन्दर कौर के शोधपत्र ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में झांसी की रानी का अवदान’ में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई हर भारतीय नारी के लिए प्रेरणा पुंज है। रानी लक्ष्मीबाई का संपूर्ण जीवन व कार्य हर नारी के लिए प्रेरणा स्रोत है जो अपना जीवन अपने दम पर सफलतापूर्वक जीना चाहती है। झांसी की रानी मुसीबत के समय में हर नारी के लिए एक जागृत शक्ति है। नारी शक्ति स्वरूपा रानी अपने शौर्य, त्याग, बलिदान का झंडा लहराए अपने जीवन में अदम्य साहस का परिचय देती है। देश को अँग्रेज़ों से स्वतंत्र करवाने लिए अंतिम साँस तक लड़ती-लड़ती सम्पूर्ण मानव जाति के लिए स्वतंत्रता की छाप गहरा करती गई।
डॉ. अनु गौड़ का ‘डॉ. मधु संधु के काव्य में मानवतावाद’ में असंख्य कविताएँ मानवतावादी विचारधारा को प्रकट करती है। कवयित्री का मन निम्न वर्ग के साथ अमानवतावादी व्यवहार, सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के संघर्ष, सामाजिक धार्मिक परंपराओं की आड़ में किया जाने वाला दोगलापन, किन्नरों के अपमान को देखकर द्रवित हो जाता है। लेखिका कहती है, “साहित्य में मानवता की बात उठेगी तो मधु संधु जी की कविताएँ बोलेंगी। मानवतावाद की प्रत्यक्ष गवाही देती ‘सतरंगे स्वप्नों के शिखर एवं संकल्प सुख’ की अधिकांश कविताएँ अपने आप में अद्वितीय है। जिनको आज आत्मसात करने की अति आवश्यकता है। मानव का मानव रहना ही समय की माँग है, इन्हीं भावों की पूर्ति करती ये सफल एवं सरस कविताएँ मानवतावाद की पक्षधर है।”
डॉ. नीलू शर्मा का ‘डॉ. मधु संधु विरचित काव्य संग्रह सतरंगे स्वप्नों के शिखर: शैलीवैज्ञानिक निर्वचनात्मक दृष्टिकोण’ में चयनित कविताओं का निर्वचनात्मक संदर्भ, उसमें निहित विशिष्ट अर्थ के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। कवयित्री का मानना है कि भ्रूण हत्याओं का आविष्कार कर विज्ञान ने उसे पितृसत्तामक दुखों के उस पार फेंका है, पूर्णत:सार्थक प्रतीत होता है, क्योंकि मानो इस भ्रूण हत्या के आविष्कार से लड़की को जो दुख झेलने पड़ते है, उससे नजात पाने के लिए ही इसका आविष्कार हुआ है, जो मानो उसके लिए किसी वरदान से कम नहीं है। कवयित्री की कविताएँ अनेक संभावनाएँ लिए हुए है। उनके काव्य संग्रहों के शैलीवैज्ञानिक निर्वचनात्मक अध्ययन के उपरांत कई अनकहे संदर्भ अपने आप ही अपने भावों का प्रकटीकरण कर उठते है।
किरीट देवनाथ का ‘ऐतिहासिक सामाजिक यथार्थ’ में ‘आकांक्षा’ कविता में हमें भारतीय समाज में प्रचलित पैतृक समाज व्यवस्था की तानाशाही की झलक मिलती है। हमारे समाज में आज भी पुरुषों के निर्णय को ही महत्त्व दिया जाता है। ‘महारावण’ में तामसी शक्तियों के भयंकर आतंक की बात करती है। दशहरे के मेले में रावण का दहन किया जाता है परन्तु फिर भी बुराई समाप्त नहीं हो रही है। इसका मूल कारण व्यक्ति स्वयं है। जब तक व्यक्ति अपने मन की बुराई को समाप्त नहीं करेगा, तब तक बुरी चीज़ें समाप्त नहीं हो सकती। मनुष्य को अपने भीतर के रावण का विनाश करना होगा।
खंड चार ‘कोश ग्रंथ’ में डॉ. राकेश प्रेम का ‘कोश जगत में एक नई शुरुआत’ में कहानी-कला से सम्बन्धित आलेख है। डॉ. मधु संधु के दो कहानी कोश हैं—कहानी कोश (1951-1960) तथा हिंदी कहानी कोश (1991-2000)। कहानी कोश (1951-1960) में 72 चर्चित लेखकों और लेखिकाओं की 600 कहानियाँ है। अधिकांश कहानियाँ सामाजिक-पारिवारिक समस्याओं से जुड़ी हुई कहानियाँ है। इस कोश की पहली संदर्भित कहानी भीष्म साहनी की कहानी ‘अकाल मृत्यु’ (1956) है तथा अंतिम कहानी रामकुमार की ‘हुस्ना बीबी’ (1953) है। कहानी-क्रम को अकारांत शैली में वर्णमाला के क्रमानुसार रखा गया है। ‘हिंदी कहानी कोश’ (1991-2000) में 200 कहानीकारों की 525 कहानियों का संकलन है। इस कोश में कहानियों का मुख्य केन्द्र बिंदु स्त्री-पुरुष सम्बन्ध है। स्त्री-पुरुष सम्बन्धों में बदलाव, स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व की छटपटाहट, पुरुष के अतिक्रमण से मुक्ति की आकांक्षा तथा विद्रोही मानसिकता इन कहानियों के केन्द्र में है।
डॉ. नीना मित्तल का ‘कहानी कोशकार: डॉ. मधु संधु’ (पंजाबी संवेदना पर आधारित कहानी कोश) में पंजाब की मिट्टी की सौंधी ख़ुश्बू से महकती कहानियों और उनके रचनाकारों का क्रमबद्ध विश्लेषण किया गया है। साहित्य समाज का दर्पण होता है। लेखिका ने समाज के विकास और पतन के घटनाक्रम को पेश करती कहानियाँ, पंजाब की संस्कृति और सभ्यता के उतार चढ़ाव की कहानियों को अपने कोश में काल क्रमानुसार स्थान दिया है। इस कोश में चयनित 91 हिंदी जगत के चमकते नक्षत्र, पंजाब की आंचलिक कहानियों के जन्मदाता की कहानियों को स्थान दिया गया है।
डॉ. सीमा शर्मा का ‘अहिंदी भाषी वसुधा की उपज-कोशकार—डॉ. मधु संधु’ में हिंदी के आधार स्तंभ कहानीकारों को अपने कहानी कोश में स्थान देकर गागर में सागर भरने की कोशिश की है। इस कहानी कोश में कमलेश्वर की पच्चीस कहानियाँ, उषा प्रियवंदा की ग्यारह कहानियाँ, मारकंडेय की सताईस कहानियाँ, मोहन राकेश की बत्तीस कहानियाँ, राजेन्द्र यादव की उनतीस कहानियाँ का मूल्यांकन कोशकार ने बड़ी सुंदरता से किया है।
डॉ. मधु संधु लिखती है कि कहानी कोश (1951-1960) तक छठे दशक की हिंदी कहानियों के विषय में आधारभूत जानकारी को संदर्भ-ग्रंथ के रूप में उपलब्ध कराने का प्रथम और श्रम साध्य प्रयास है। साहित्य जगत में कोश लेखन एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। डॉ. संधु ने समय-समय पर हिंदी कहानी विधा में प्रतिक्रियाओं पर हुई प्रतिक्रिया से उत्पन्न नवीनताओं को बड़ी कुशलता के साथ समाहित किया और साहित्य जगत विभिन्न कहानी कोश दिए।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. मधु संधु जी के रचनाकर्म को बहुत ही सुन्दर ढंग से विश्लेषित किया गया है और मेंरा दृढ़ विश्वास है कि यह पुस्तक डॉ. मधु संधु के साहित्य को जानने-समझने-परखने में नव-साधकों/अनुसंधित्सुओं को असीम सहयोग प्रदान करेगी।
डॉ. देवेन्द्र कुमार
सह-आचार्य (हिन्दी), खालसा कॉलेज, गढ़दीवाला
मोबाइल-98882-04394