सँवरकी

धीरज श्रीवास्तव (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

आज अचानक हमें अचम्भित, 
सुबह-सुबह कर गयी सँवरकी। 
कफ़ ने जकड़ी ऐसे छाती, 
खाँस-खाँस मर गयी सँवरकी। 
 
जूठन धो-धोकर, ख़ुद्दारी, 
बच्चे दो-दो पाल रही थी। 
विवश ज़रूरत जान बूझकर, 
बीमारी को टाल रही थी। 
कल ही की तो बात शाम को
ठीक-ठाक घर गयी सँवरकी। 
 
लाचारी पी-पीकर काढ़ा
ढाढ़स रही बँधाती मन को। 
आशंकित थी, दीमक बनकर, 
टीबी चाट रही है तन को। 
संघर्षों से हाथ छुड़ाकर
भव सागर तर गयी सँवरकी। 
 
करवानी थी जाँच ख़ून की, 
मदद पाँच सौ माँग रही थी। 
हमको लगा ग़रीबी शायद, 
रच फिर कोई स्वाँग रही थी, 
फूट-फूट कर रोई पीछे, 
सम्मुख हँसकर गयी सँवरकी। 
 
देती रही दुहाई सेवा, 
कुटिल स्वार्थ ने व्यथा न जानी। 
करती रही याचना झोली
अडिग रहा बटुआ अभिमानी। 
वैभव के पनघट से लेकर, 
ख़ाली गागर गयी सँवरकी। 
 
खड़ी हुई लज्जित निष्ठुरता, 
शव के आगे शीश झुकाये। 
पूछ रहा सामर्थ्य स्वयं से, 
अब वह किससे खेद जताये। 
जाते-जाते, पढ़ा प्रेम के, 
ढाई आखर गयी सँवरकी। 

2 टिप्पणियाँ

  • 1 Jun, 2026 11:42 PM

    Very beautiful poem full of emotions. Extremely heart touching.

  • 1 Jun, 2026 08:16 PM

    बहुत ही शानदार गीत है धीरज श्रीवास्तव जी का,मनुष्य के भीतर मृत हो रही संवेदनाओं को पुनर्जीवित करने की कोशिश करता हुआ बेहतरीन गीत!❤️❤️

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