रिक्शे वाले

01-06-2026

रिक्शे वाले

धीरज श्रीवास्तव (अंक: 298, जून प्रथम, 2026 में प्रकाशित)

 

फटे पाँव हाथों में छाले। 
मगर मस्त हैं रिक्शे वाले। 
 
रोज़ थिरकतीं मदहोशी में, 
साँझ ढले आशाएँ भोली। 
स्वप्न अधूरे ठर्रा पीकर, 
नमक चाट कर करें ठिठोली। 
फुटपाथों पर नग्न ग़रीबी
पड़ी अगौंछा मुँह पर डाले। 
 
सेंक रही है बैठ विवशता
ईंटों के चूल्हे पर रोटी। 
प्यासा गला ढूँढ़ता फिरता
सड़क किनारे नल की टोटी। 
भूख निगलती प्याज़ तोड़कर
हरी मिर्च के साथ निवाले। 
 
अक्सर करते जाम सड़क को, 
रैली, धरने बैनर झंडे। 
खिसियाई खाकी बरसाती, 
रिक्शे के कूल्हों पर डंडे। 
भद्दी-भद्दी गाली खाकर, 
अपमानों के पीते प्याले। 
 
ठंड गिराती आसमान से, 
साथ ओस के भाई-चारा। 
एक फटे कम्बल में करते, 
राधे-जुम्मन साथ गुज़ारा। 
भिड़ें अज़ानें शंखों के संग, 
या मस्ज़िद से लड़ें शिवाले। 

1 टिप्पणियाँ

  • 1 Jun, 2026 11:39 PM

    This poetry is quite enriching and truly resembles the life of workers. Great job dheeraj ji. Looking forward to more such creative pieces.

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