संदूक के भीतर मैं

15-07-2026

संदूक के भीतर मैं

शारदा गुप्ता (अंक: 301, जुलाई द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मेरे घर के सबसे अँधेरे कोने में
एक पुराना संदूक रखा था,
 
लकड़ी का नहीं—
समय की पसलियों से बना हुआ।
 
उस पर जमी धूल
दरअसल वर्षों की चुप्पियाँ थीं,
जिन्हें मैंने कभी झाड़ा नहीं,
क्योंकि कुछ सच
धूल बनकर ही सुरक्षित रहते हैं।
 
जब मैंने उसे खोला,
तो सोने-चाँदी नहीं निकले,
 
निकला मेरा ही एक अधूरा बचपन,
जिसकी जेब में अब भी
कंचों की खनक फँसी हुई थी।
 
निकली मेरी माँ की वह हँसी,
जो रोटी बेलते-बेलते
आटे में कहीं खो गई थी।
 
निकला मेरे पिता का मौन,
जो जीवन भर
कीलों की तरह घर में धँसता रहा,
और छत को गिरने से बचाता रहा।
 
एक कोने में पड़ी थीं
मेरी कुछ असफलताएँ,
 
वे सूखे फूलों जैसी थीं—
सुगंध जा चुकी थी,
पर अर्थ अब भी बाक़ी था।
 
नीचे की तह में
मुझे एक टूटा हुआ दर्पण मिला।
 
उसमें मेरा चेहरा नहीं दिखता था,
 
दिखती थीं मेरी ही वे इच्छाएँ
जिन्होंने मुझे मुझसे ही
अजनबी बना दिया था।
 
फिर सबसे भीतर,
जहाँ हाथ भी काँपते हुए पहुँचते हैं,
मुझे एक और संदूक मिला।
मैं चकित रह गई—
संदूक के भीतर संदूक!
 
उसे खोला तो
न स्मृतियाँ थीं,
न रिश्ते,
न उपलब्धियाँ,
न पछतावे।

वहाँ केवल रिक्तता थी।
और उसी रिक्तता में
एक धीमी आवाज़ उठी—
 
“जो कुछ ऊपर रखा था,
वह सब उधार था।
माँ, पिता, प्रेम, पराजय,
यश, अपयश,
सुख और शोक—
सब यात्रा के सामान थे।
 
तू उन्हें अपना समझती रही,
इसलिए बोझिल रही।”
 
मैं देर तक
उस ख़ालीपन को देखती रही।
 
तब जाना मैंने—
 
मनुष्य का जीवन
एक संदूक भरने की नहीं,
उसे धीरे-धीरे ख़ाली करने की साधना है।
 
अंततः जब मृत्यु आएगी,
वह कोई डाकू नहीं होगी,
 
वह उस वृद्ध कारीगर की तरह आएगी
जिसने यह संदूक बनाया था,

और मुस्कराकर पूछेगी—
 
“जो मेरा था, लौटा दिया?
या अब भी
संदूक को ही अपना घर समझ बैठी हो?”

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