छिपकली
शारदा गुप्ता
कल रात
मैंने दीवार पर चिपकी एक छिपकली को देखा।
वह स्थिर थी,
इतनी स्थिर
कि लगा जैसे समय ने
अपनी थकी हुई पीठ
वहीं टिका दी हो।
कमरे में अँधेरा था,
पर उसकी आँखों में
एक अजीब-सी प्रतीक्षा जल रही थी।
वह किसी कीट की राह देख रही थी,
ऐसा सब कहते हैं।
पर मुझे लगा,
वह कीट नहीं,
किसी उत्तर की प्रतीक्षा कर रही है।
मैं देर तक उसे देखती रही।
फिर मन में प्रश्न उठा—
क्या सचमुच वह दीवार पर चिपकी है,
या दीवार ही
उसकी पकड़ में क़ैद है?
कितना विचित्र है—
जिसे हम छोटा जीव समझते हैं,
वह गिरती नहीं।
और जिन्हें ईश्वर ने
विचारों के पंख दिए,
वे हर दिन टूट जाते हैं।
छिपकली ने कोई उत्तर नहीं दिया।
उसका मौन
किसी वृद्ध ऋषि जैसा था,
जो जानता बहुत हो,
पर कहता कुछ न हो।
तभी एक कीट
रोशनी के पास भटका।
छिपकली झपटी।
एक क्षण में वह जीवन
किसी दूसरे जीवन का भोजन बन गया।
मैं काँप गई।
मुझे लगा,
यही तो संसार है।
हम सब
किसी न किसी रोशनी के मोह में
भटकते हुए कीट हैं,
और समय
दीवार पर बैठी छिपकली।
वह प्रतीक्षा करता है,
फिर एक दिन
हमें अपनी जीभ पर उठा लेता है।
मैंने खिड़की से बाहर देखा।
आकाश में चाँद था।
दीवार पर छिपकली थी।
और भीतर
एक और छिपकली थी—
मेरे मन की।
वह भी वर्षों से
इच्छाओं की दीवार पर चिपकी हुई थी।
कभी प्रशंसा का कीट पकड़ती,
कभी प्रेम का,
कभी सफलता का,
कभी किसी अधूरे स्वप्न का।
और हर बार
कुछ निगल लेने के बाद भी
उसे भूख लग जाती।
तब मुझे लगा—
भूख पेट की नहीं होती,
अस्तित्व की होती है।
और कोई शिकार
उसे कभी तृप्त नहीं कर सकता।
रात और गहरी हो गई।
छिपकली अब भी वहीं थी।
दीवार अब भी वहीं थी।
पर मैं बदल चुकी थी।
पहली बार समझ पाई—
छिपकली की महानता
उसके शिकार में नहीं,
उसकी प्रतीक्षा में है।
वह जानती है
कि कब स्थिर रहना है,
और कब छलाँग लगानी है।
मनुष्य की सारी त्रासदी यही है—
वह प्रतीक्षा में भी भागता रहता है,
और प्राप्ति के बाद भी।
जब मैं सोने लगी,
तो लगा
दीवार पर बैठी छिपकली
धीरे से मुस्कराई है।
और उसके मौन ने मुझसे पूछा—
“तू जीवन भर
क्या पकड़ती रही?
और जो पकड़ लिया,
क्या वह कभी तेरा हुआ?”
मैंने आँखें बंद कर लीं।
उत्तर कहीं नहीं था।
केवल एक दीवार थी,
एक छिपकली थी,
और उनके बीच लटका हुआ
मेरा समूचा जीवन।
आज मैंने
एक छिपकली को तितली खाते देखा।
दृश्य छोटा था,
पर उसके भीतर
एक पूरा दर्शन तड़प रहा था।
तितली अभी-अभी
किसी फूल की स्मृति से निकली थी।
उसके पंखों पर
रंग नहीं,
मानो ऋतुओं की प्रार्थनाएँ लगी थीं।
वह हवा में लिखी हुई
एक क्षणिक कविता थी,
जिसे ईश्वर ने
बहुत प्रेम से रचा होगा।
पर दीवार पर बैठी छिपकली ने
उसे एक ही झटके में निगल लिया।
मैं स्तब्ध रह गई।
मुझे लगा,
सौंदर्य हार गया।
क्रूरता जीत गई।
फूल हार गए।
भूख जीत गई।
कविता हार गई।
यथार्थ जीत गया।
पर तभी
मेरे भीतर बैठे किसी वृद्ध विचार ने कहा—
“इतनी जल्दी निर्णय मत कर, शारदा।”
मैं चुप हो गई।
फिर देखा—
तितली अपने रंगों पर गर्व कर सकती थी,
पर उसकी भूख
उसे फूल तक ले जाती थी।
छिपकली कुरूप दिखाई दे सकती थी,
पर उसकी भूख
उसे तितली तक ले आई थी।
दोनों के बीच
दोषी कोई नहीं था।
दोनों ही
अपने-अपने अभाव की दासियाँ थीं।
तब मुझे लगा—
संसार में अधिकांश हिंसा
द्वेष से नहीं,
भूख से जन्म लेती है।
किसी को रोटी की भूख,
किसी को प्रेम की,
किसी को सम्मान की,
किसी को अमर हो जाने की।
और हम सब
अपनी-अपनी भूख के लिए
किसी न किसी तितली को खा रहे होते हैं।
कोई किसी का विश्वास खाता है,
कोई किसी का समय,
कोई किसी का श्रम,
कोई किसी का सपना।
मैं देर तक
उस दीवार को देखती रही।
जहाँ अभी कुछ क्षण पहले
रंग उड़ रहे थे,
अब केवल सन्नाटा था।
तभी एक प्रश्न
मेरे भीतर उतरा—
क्या तितली सचमुच मर गई?
उसके पंख तो चले गए,
पर क्या रंग भी चले गए?
क्या सौंदर्य इतना छोटा होता है
कि एक भूख उसे समाप्त कर दे?
शायद नहीं।
शायद तितली
छिपकली के पेट में नहीं,
मेरी स्मृति में जीवित रह गई।
और तभी समझ आया—
इस संसार में
जो सबसे सुंदर होता है,
वह सबसे अधिक नश्वर भी होता है।
फूल,
तितलियाँ,
प्रेम,
यौवन,
विश्वास,
और मनुष्य का जीवन।
शायद इसी कारण
ईश्वर उन्हें अधिक समय नहीं देता।
क्योंकि अनंत समय मिल जाए,
तो चमत्कार भी आदत बन जाते हैं।
रात को सोते समय
मैंने आख़िरी बार उस दृश्य को याद किया।
एक दीवार,
एक छिपकली,
एक तितली।
और लगा—
जीवन भी शायद यही है।
हम सब अपने रंगों पर मुग्ध रहते हैं,
जबकि समय,
एक शांत छिपकली की तरह,
किसी कोने में बैठा
धीरे-धीरे
हमारी ओर बढ़ रहा होता है॥