समय पड़े तो आँखों को अंगार कीजिए
डॉ. गोरख प्रसाद ’मस्ताना’समय पड़े तो आँखों को अंगार कीजिए
अपनी दोनों बाँहों को तलवार कीजिए
आकर्षक गुलदान बनाये जिस लोहे से
उसे ढाल अब रक्षा का हथियार कीजिए
वक़्त नहीं अधिकार- हनन पर चुप्पी का
ज़ोर ज़ुल्म व शोषण का प्रतिकार कीजिए
अस्त्र अंधविश्वासों का फेंका है उसने
प्रज्ञा से उसको अपनी, बेकार कीजिए
कंस रहे बन कर, क्या पाये बोलें ना
अब तो कान्हा जस अपना किरदार कीजिए
नींद चुरायी आँखों से जिसने तेरी
प्यार से, उसका जीना भी दुश्वार कीजिए
नाबीना है, ठोकर लगने का डर है
आँख से अपनी, पथ उसका हमवार कीजिए