रुकेंगे नहीं और दौड़ेंगे भी नहीं
सिया लेखनी
रोना मुझे कमज़ोर और,
सोना मुझे लाचार नहीं बनाता!
यह मेरे चेतना के वो लक्षण हैं,
जहाँ, जहाँ मैं ख़ुद को सँजोती
और विराम देती हूँ।
बल्कि, यह मेरी ऊँचाई का मार्गदर्शन
करता है!
जहाँ भले ही मैं धीर-धीरे चलूँ
लेकिन रुकूँ नहीं।
क्योंकि किसी चीज़ का भी ठहराव नहीं,
मन, समय और जीवन तीनों गति में हैं।
ठीक वैसे ही, जैसे हँसना मेरी मज़बूती का
प्रमाण नहीं,
और उलझ के रहना मेरी नादानी नहीं!
क्योंकि प्रश्नों में अटक के विचार
करना ही तो शुरूआत है।
हाल ही में, भले धावक नहीं बनूँगी
किन्तु, टहलते हुए आगे बढ़ूँगी।
ख़ुद हो महसूस करते और जीते हुए।