अनुभव का होना
सिया लेखनी
कविता:
प्रतीक्षा रही . . .!!
किन्तु समय अपनी गति से गुज़रता रहा . . .
और पता चला—
कुछ भी
स्थिर नहीं।
सब
अस्थिर है—
सर्वत्र, हर चीज़ . . .
सिवाय
सँभालने वाले के।
फिर हम भी अस्थिर हुए,
ख़िरामाँ-ख़िरामाँ . . .
चाहे वह
फूलों का खिलना–मुरझाना हो,
या गीत-संगीत का
सुर–बेसुर होना . . .
चाहे वह
उम्र का गुज़रना ही क्यों न हो।
वक़्त और उम्र का गुज़रना
अनुभव का होना नहीं।
किसी भी चीज़ का
प्रत्यक्ष रूप से,
समझ के साथ
घटित होना—
यही अनुभव का होना होता है . . .