रूट्स की बातें (साक्षात्कार) इला प्रसाद जी के साथ
शुभ्रा ओझालोकप्रिय एवं बहुचर्चित साहित्यकार इला प्रसाद जी का जन्म झारखंड की राजधानी राँची में हुआ। राँची विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातकोत्तर करने के पश्चात् आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से भौतिकी में पीएच. डी. की। आपने मुंबई आईआईटी में कुछ वर्षों तक शोध कार्य किया एवं आपके शोध पत्र अमेरिका के विशिष्ट जर्नलों में प्रकाशित भी हुए। वर्तमान में सेंट थॉमस यूनिवर्सिटी में भौतिक विज्ञान की प्रोफ़ेसर होने के साथ ही पिछले डेढ़ दशकों से इला जी लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं, अब तक देश-विदेश की लगभग सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में आपकी रचनाएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। आपकी रचनाओं का मराठी, तेलुगू, ओड़िया, सिंधी, नेपाली और अंग्रेज़ी में अनुवाद हो चुकाआपका लेखन प्रवासी रचनाकारों की कृतियों पर हो रहे शोध प्रबंधों का अनिवार्य अंग है। आपकी कई कहानियाँ विश्वविद्यालयों के पाठक्रम में भी शामिल हैं।
द संडे इंडियन द्वारा हिन्दी की एक सौ एक सर्वश्रेष्ठ रचनाकारों में इला जी का नाम शामिल है।
आपकी प्रकाशित पुस्तकें हैं: धूप का टुकड़ा, नए रास्तों पर, (कविता संकलन) इस कहानी का अंत नहीं, उस स्त्री का नाम, तुम इतना क्यों रोई रूपाली, जीवन कहाँ है, आवाज़ों की दुनिया, मेरी चयनित कहानियाँ (कहानी संकलन), रोशनी आधी-अधूरी सी और वह दिन आएगा ज़रूर (उपन्यास)।
शुभ्रा ओझा:
भारत से अमेरिका कब और कैसे आना हुआ?
इला प्रसाद:
जब मैं बी एच यू में थी तब मेरा सपना था कि मैं अमेरिका आकर भौतिकी में शोध करूँ लेकिन स्थितियाँ कुछ ऐसी बनींपिता जी ने कहा कि “तुम विवाह कर लो ताकि मेरी ज़िम्मेदारी ख़त्म हो जाए।” एक मित्र के सहयोग से मेरा विवाह हो गया और मैं अपने पति नरेन के साथ अमेरिका आ गई। वह समय 9/11का था तो लोग यहाँ डिप्रेशन में थे, नौकरियों की कमी हो गई थी तो मेरे साथ भी यही हुआ कि बहुत तलाशने के बाद भी मुझे मनपसंद नौकरी नहीं मिली, लेकिन मैंने हार नहीं मानी शुभ्रा और उस समय का अपना सारा समय सिर्फ़ लिखने में लगा दिया। जो तुमने मेरे सारे संग्रह गिनाए उनमें अधिकांश मैंने उसी दौरान लिखे, ख़ूब लेखन कार्य किया। अनेक पत्रिकाओं में छपती रही। लेखन क्षेत्र में अपना नाम बनाया।
इसके बाद मैंने कई स्कूलों में पढ़ाया फिर कॉलेज में और अब यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हूँ। अब तो मेरा रिसर्च पेपर भी प्रकाशित हो चुका है।
शुभ्रा ओझा:
आप स्वयं एक साहित्यिक पारिवारिक परिवेश से आती हैं तो क्या आप उसके विषय में कुछ बताएँगी?
इला प्रसाद:
मेरे पिताजी जी का क्षेत्र हिंदी अध्यापन था, वे रांची विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे और विभागाध्यक्ष एवं डीन के पद से वह रिटायर्ड हुए। वह क्षेत्रीय भाषा के मर्मज्ञ थे, उन्होंने लोक साहित्य-संस्कृति पर भी बहुत काम किया। अच्छे कवि तो थे ही।
हमारे घर का वातावरण पूर्ण साहित्यिक था। फ़ादर कामिल बुल्के से हमारे परिवार का बहुत निकट सम्बन्ध था, पिताजी उनके निकटतम सहयोगी रहे।
मेरे पिताजी के शोध का क्षेत्र जयशंकर प्रसाद रहे।
अनेक सम्मानों से पिताजी को सम्मानित किया गया था जिनमें केंद्रीय हिंदी संस्थान का राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार, राधाकृष्ण पुरस्कार एवं अक्षर कुम्भ सम्मान प्रमुख है।
हमारे घर में पुस्तकालय होने की वजह से बचपन से ही हमें पढ़ने की आदत लग गई। मुझे लगता है साहित्य का बीज हम भाई-बहनों में उन किताबों की वजह से ही पड़ा जो पिताजी हम लोगों के लिए लाते थे।
शुभ्रा ओझा:
प्रतिष्ठित साहित्यकारों में आपका नाम एक कहानीकार के रूप में आता है तो मैं आपसे जानना चाहती हूँ कि कहानियों के लिए आप पृष्ठभूमि कैसे चुनती हैं?
इला प्रसाद:
मूल कथ्य के अनुसार ही पृष्ठभूमि बन जाती है। वह चयन अनायास ही होता है। उदहारण के लिए ‘खिड़की’ कहानी को लो। अमेरिका में ऐसे घर नहीं होते जहाँ बाहर को खुलती हुई खिड़की न हो। ऐसा भारत में ही हो सकता है। स्त्री की जो कुंठा और घुटन खिड़की की अनुपस्थिति के माध्यम से अभिव्यक्त होती है वह इस परिवेश में उस प्रतीक के माध्यम से नहीं कही जा सकती थी।
इसी तरह जो अमेरिकी परिवेश की कहानियाँ हैं उनका कथ्य कुछ ऐसा है जो भारत में उस रूप में घटित नहीं हो सकता। ‘बैसाखियाँ’ सेंट पैट्रिक्स डे की पृष्ठभूमि में रचित कहानी है। ‘वीसा’ कहानी भी अमेरिकी परिवेश की कहानी ही हो सकती थी।
हाँ, कथ्य का चयन करने में मैं बहुत सावधान रहती हूँ। जो कुछ अनकहा रह गया है उसी पर मेरी क़लम चलती है।
शुभ्रा ओझा:
मैंने आपकी कई कहानियाँ पढ़ी हैं जिनमें से कुछ कहानियों के शीर्षक वस्तुओं के नाम पर थे जैसे: मेज़, खिड़की आदि। इस प्रकार का शीर्षक रखने का कोई विशेष कारण?
इला प्रसाद:
शुभ्रा, पहले मैं इतना सोचकर नहीं लिखती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है, अब कहानियों को मैं बहुत सोच-समझ कर लिखती हूँ। जिन कहानियों के शीर्षक का तुमने ज़िक्र किया वह सब मेरे लेखन के प्रारंभिक दिनों की कहानियाँ हैं, यहाँ तुम्हें यह बता दूँ कि मेरी ‘मेज़’ कहानी उन दिनों कादम्बिनी पत्रिका में छपी थी और इस कहानी के लिए मुझे पाठकों के बहुत सारे पत्र मिले थे। खिड़की और मेज़ कहानी के शीर्षक प्रतीकात्मक भी हैं। मूल कथ्य इन वस्तुओं के इर्द-गिर्द घूमता है। मेज़ कहानी में कई अर्थ छायाएँ हैं। खिड़की के माध्यम से स्त्री की घुटन अभिव्यक्त हुई है।
यह सारी कहानियाँ मेरे द्वारा बहुत ही सहज ढंग से लिखी गईं।
शुभ्रा ओझा:
आप भौतिक विज्ञान की प्रोफ़ेसर है, अंग्रेज़ी वातावरण में रहतीं हैं तो इन दो भाषाओं के बीच हिन्दी को कैसे संतुलित करती हैं?
इला प्रसाद:
पहले-पहल जब हिन्दी में लिखती थी तो कोई समस्या नहीं आती थी लेकिन अब कुछ वर्षों से जब लिखने बैठती हूँ तो सारे विचार, कहानियों के पात्र और संवाद अंग्रेज़ी में आते हैं, कभी-कभी मैं अंग्रेज़ी में ही उसे बढ़ा देती हूँ और कभी अपनी भावनाओं को अंग्रेज़ी में बढ़ने से रोक कर हिन्दी में लिखने लगती हूँ।
बहुत सालों से यूनिवर्सिटी में बच्चों को पढ़ाते हुए निश्चित रूप से अंग्रेज़ी में सोचने की बढ़त हुई है परन्तु हिन्दी अब भी मेरी उँगली पकड़े मेरे साथ चल रही है।
शुभ्रा ओझा:
निरंतर लिखते रहने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिलती है?
इला प्रसाद:
. . . समय ईंधन जुटाता है मेरी रचनाओं के लिए और परिस्थितियों की आँच पर सीझती है रचना। लेखन वह विराम का पल है जो मैं अपने कार्य व्यस्त जीवन से चुराती हूँ। लेखन से मुझे बहुत ऊर्जा मिलती है। संतुलन बना रहता है। अभिव्यक्ति का यह माध्यम मुझे वरदान की तरह लगता है इसलिए लिखती रहती हूँ।
मेरे पाठक, मित्र लेखक, शोधार्थी और पढ़ते रहने की आदत का भी बहुत बड़ा योगदान है इसमें।
शुभ्रा ओझा:
पाठकों के लिए आपकी कोई पसंदीदा कविता।
इला प्रसाद:
अपनी एक कविता पाठकों के समक्ष रखना चाहूँगी जिसका शीर्षक है “अपना शहर”
अपना शहर
एक बार फिर घर लौटा हूँ
देखने के लिए कि मेरी स्मृतियों में जो बसा रहा
वह शहर अब भी कितना मेरा है!
पैर ठिठकते-चलते हैं
मुड़ते रहते हैं पहचाने मोड़ों-गलियों में
और औचक खड़ा रह जाता हूँ मैं
कि यह सड़क तो अब पहचान में नहीं आती
कोई जान-पहचान वाला अब इन गलियों में नहीं रहता!
वो पुराना तालाब बिला गया, चले गये कहीं और,
मेरे परिचित, सब लोग
तब भी उमग-उमग आता है मन
अपने शहर में होने भर से
बिला गई सी वे अपरिपक्व प्रेम स्मृतियाँ
फिर से सतह पर आ गई हैं
जबकि
उनका अर्थ खो चुका!
अब अनसुनी कहानियाँ हैं
अनपहचाने प्रेम, लोक सब
जिनसे बार-बार मिलता हूँ
और अपने को, शहर को नये सिरे से पहचानता हूँ
उस शहर को, जो अब मुझे नहीं पहचानता
और मैं
जिसके नाम से पहचाना गया
जहाँ कहीं भी गया।
शुभ्रा ओझा:
प्रवासी साहित्यकारों में आपके पसंदीदा साहित्यकार कौन हैं?
इला प्रसाद:
शुभ्रा, देश-विदेश के मेरे बहुत से प्रिय साहित्यकार हैं लेकिन अगर तुम प्रवासी साहित्यकारों के बारें में पूछोगी तो मैं सबसे पहले कहूँगी कि साहित्यकार सिर्फ़ ‘साहित्यकार’ होता है, प्रवासी एवं अप्रवासी नहीं होता है।
मैंने कई लेखकों को पढ़ा जिनमें उषा राजे सक्सेना, कमला दत्त, दिव्या माथुर, सुषम बेदी और उषा प्रियवंदा जी हैं, इनके से उषा प्रियवंदा जी का नाम प्रमुखता से लेना चाहूँगी क्योंकि उनको पढ़ते हुए मैं बड़ी हुई और यहाँ अमेरिका आने के बाद मैंने उन्हें पत्र भी लिखे। मेरी कहानी संग्रह पर उनका उनका शुभकामना संदेश भी पत्र-स्वरूप मुझे प्राप्त हुआ, जिसे मैंने सँभाल कर रखा है।
शुभ्रा ओझा:
आपको विश्व हिन्दी सम्मेलन 2007 में शामिल होने का अवसर मिला है, क्या अपने अनुभव हमारे साथ साझा करेंगी?
इला प्रसाद:
मेरे लिए विश्व हिन्दी सम्मेलन की सबसे अच्छी बात यह रही कि उसमें मेरी पुस्तक का विमोचन हुआ। यहाँ मैं अंजना संधीर जी का धन्यवाद करना चाहूँगी क्योंकि उन्हीं की वजह से मेरे साथ-साथ अमेरिका के कई लेखक मित्रों के किताबों की प्रदर्शनी वहाँ उस विश्व हिन्दी सम्मेलन में लग पाई। अंजना जी ने दो पुस्तकों ‘प्रवासिनी के बोल’ और ‘प्रवासी आवाज़’ के द्वारा हम अमेरिकी लेखकों को आपस में जोड़ने का कार्य किया।
शुभ्रा ओझा:
चलिए अब आपसे कुछ प्रश्न पूछती हूँ लेकिन आपको उनका उत्तर एक वाक्य में देना है:
अंग्रेज़ी का एक पसंदीदा शब्द कौन सा है?
इला प्रसाद:
“लव” अंग्रेज़ी का मेरा पसंदीदा शब्द है।
शुभ्रा ओझा:
आपको मिला कोई पसंदीदा गिफ़्ट क्या था?
इला प्रसाद:
मुझे गिफ़्ट में पुस्तकें पसंद है।
शुभ्रा ओझा:
आपको हिन्दी सिनेमा का कौन सा अभिनेता पसंद है?
इला प्रसाद:
संजीव कुमार मेरे पसंदीदा अभिनेता हैं।
शुभ्रा ओझा:
आपकी कोई अच्छी आदत जो आपको बहुत पसंद है?
इला प्रसाद:
मुझे खाना पकाना पसंद है।
शुभ्रा ओझा:
आप कहानी को एक शब्द में कैसे परिभाषित करेंगी?
इला प्रसाद:
मेरे लिए एक शब्द में कहानी मतलब ‘संप्रेषण’।
शुभ्रा ओझा:
इला जी आपसे बातें करके बहुत अच्छा लगा, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद।
इला प्रसाद:
तुम्हार भी धन्यवाद शुभ्रा।