रीढ़
सुनीता मंजू
झुकती है कभी तनती है
अच्छी लगती है जब तनती है
गर्व से, आत्मसम्मान से,
स्वाभिमान से।
अच्छी लगती है, जब झुकती है
शर्म से, हया से,
आदर से, प्रेम से।
सुहाती नहीं जब झुकती है
चापलूसी में, ठकुरसुहाती में,
जी हुज़ूरी में।
सुहाती नहीं जब तनती है
घमण्ड से, शक्ति के मद से,
दमन में, दलन में, शोषण में।
झुकने और तनने की
मुश्किल से निजात पायी उन्होंने
बन गये केंचुआ।