प्रकाश पुंज

15-04-2026

प्रकाश पुंज

डॉ. नितिन पाटील (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

वर्षों पहले निकला था मैं, 
खोज में उस प्रकाश-पुंज की
जो बदल सकता था वह सब
सभ्यता, समाज, व्यवस्था। 
 
बढ़ रही थी अब उम्र, 
थरथरा रहे थे हाथ, शरीर, मन, 
काँप रही थीं धमनियाँ, 
किन्तु जीवित थी अब भी चेतना
उसे खोजने की। 
 
संघर्ष से थक चुका था मन, 
थक चुका था समाज, 
फिर भी बढ़ रहे थे कुछ क़दम आगे
वे, जो थे मेरे पीछे
हाथों में मशाल लिए, 
खोजने उसी प्रकाश-पुंज को
जिसे खोजने निकला था मैं
अपनी युवा अवस्था में। 

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