लोकतंत्र का बाज़ार

15-04-2026

लोकतंत्र का बाज़ार

डॉ. नितिन पाटील (अंक: 295, अप्रैल द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

मछलियो ओ मछलियो, 
क्या हो गई हो अंधी? 
क्यों नहीं पहचान पातीं
मछुआरों के जाल को? 
 
ये आते हैं हर पाँच साल बाद, 
और फेंकते हैं अपने जाल, 
चमकते हैं इनके वादे, 
और तुम समझ नहीं पातीं
इनके असली इरादे। 
 
जैसे ही फँसती हो तुम इनके जाल में, 
ये चल पड़ते हैं अपनी चाल, 
ले जाते हैं तुम्हें बाज़ार, 
जहाँ तुम्हारे जीवन की क़ीमत पर
गिनते हैं हज़ार। 
 
और तब तुम कहती हो
“व्यवस्था ही दोषी है” 
नहीं, दोष तुम्हारा भी है, 
क्योंकि तुम्हारे अंत का कारण
केवल व्यवस्था नहीं, 
बल्कि तुम्हारा लालच, 
लोभ, स्वार्थ और शराब है।

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