मयंक शर्मा – सवैया – अनन्य अनुराग
मयंक शर्मा
देह लसैं पट-पीत अरु कल कानन कुण्डल छाजत सोहैं,
शीश पे सोहत मोरपखा, गल-माल बिराजति मोहति मोहैं;
गोल-कपोल रूचैं झलकैं, मुख-साँवरे-मोहन-राजति जोहैं;
नाथ के नाम अपार-अनंत, जा जग में नहिं जानत कोहैं?
देह लसैं पट-पीत अरु कल कानन कुण्डल छाजत सोहैं,
शीश पे सोहत मोरपखा, गल-माल बिराजति मोहति मोहैं;
गोल-कपोल रूचैं झलकैं, मुख-साँवरे-मोहन-राजति जोहैं;
नाथ के नाम अपार-अनंत, जा जग में नहिं जानत कोहैं?