मायाजाल: एक विशिष्ट चिन्तन की कृति
विजय रंजनसमीक्षित पुस्तक: मायाजाल (कहानी संग्रह)
लेखक: दिव्या माथुर
समीक्षक: विजय रंजन
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली, भारत
मूल्य: ₹300
पृष्ठ संख्या: 152
ISBN: 9789355621795
वर्तमान में लंदन प्रवासी बहुचर्चित हिन्दीसेवी कवयित्री, कहानीकार और उससे बढ़ कर प्रांजल साहित्यिक मेधा की धनी, कर्मठ बौद्धिक दिव्या माथुर द्वारा प्रणीत कहानी-संग्रह ‘मायाजाल’ प्रभात प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित है। 8 कविता-संग्रह, 3 उपन्यास और 8 कहानी-संग्रह की रचयिता, रॉयल सोसायटी ऑफ़ साईंस की फ़ैलो तथा अन्तर्राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था ‘वातायन’ की संस्थापक दिव्या माथुर की साहित्यिक लब्धियों में ‘मायाजाल’ विशेष है इसलिए नहीं कि इस कहानी-संग्रह में 17 कहानियाँ हैं या कि इसमें ख्यात कथाकार नासिरा शर्मा, चित्रा मुद्गल, डॉ. असगर वजाहत, डॉ. कमलकिशोर गोयनका आदि ख्यातिलब्ध वरिष्ठ साहित्यकारों की सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ भी प्रकाशित हैं वरन् ‘मायाजाल’ मेरी दृष्टि में विशिष्ट इसलिए है कि इसमें लेखिका ने विश्व भर के नर-नारियों की मानवीय संवेदनाओं पर शोध जैसा आलेखन करते हुए करुणा, प्रेम, सद्भाव, सदाचार और सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि का आरेखन इस रूप में किया है कि सम्पूर्ण विश्व के सुख-दुःख, राग-द्वेष आदि के मनोभाव ‘समरूपी’ प्रतीत होते हैं। इस कृति में लेखिका ने वह गवाक्ष भी रेखायित कर दिया है जिसके माध्यम से हम पाश्चात्य जीवन-शैली से और उसकी निस्सारता से परिचित हो सकते हैं।
संग्रह की प्रमुख कहानी ‘मायाजाल’ है, जिसके शीर्षक पर आलोच्य कृति का शीर्षक नामांकित है। ‘मायाजाल’ से लेकर ‘करारनामा’, ‘ई-रिश्ता’, ‘हिमखण्ड’, ‘कैपचीनो रोमांस’, ‘उसका नाम’, ‘बेचारी सिनथिया’, ‘ई-सुलह’, ‘नामर्द’, ‘राधा-राधा’, ‘बेक्ड बीन्स’, ‘ढिंढोरा’, ‘पंजाबन’, ‘आशियाना’, ‘हबशन’, ‘स्पेयर ए थाट प्लीज’, ‘बाबा-अम्मा और मैं’ तक प्रायः सभी कहानियों में मानवीय संवेदना, मानवीय संचेतना, मानवीयता आदि मनोभावों का सफल मनोवैज्ञानिक चित्रांकन भी उकेरित है।
शीर्षक कहानी ‘मायाजाल’ में भारतीय जीवन-मूल्य, भारतीय दर्शन, आत्मा, परमात्मा और प्रकृति के त्रैतवाद के साथ-साथ क्षणिक सत्य से दिखने वाले आभासी प्राकृतिक मायाजाल का अन्तःनिहित साहित्यिक अक्षरांकन भी किया है लेखिका ने। लेखिका ने रूपकस्वरूप में इसे ‘हेलुसिनेशन’ कहा है।
‘मायाजाल’ में अतीन्द्रिय अनुभवों का भी चित्रांकन है। 12 घंटे के गम्भीर आपरेशन वाले कैंसर से जूझते मरीज के मनोभावों का सफल शब्दांकन दर्शाते हुए कहानी में आउट ऑफ़ बॉडी एक्सपीरियंस के अनुभूत संवेगों का उकेर अत्यन्त प्रभावशील है। पूर्वजन्म की बातें और ‘आपरेशन के लिए निकलने से पूर्व घर के बच्चों को, हरी-भरी प्रकृति को, आसमान को अच्छे से आत्मसात् करने आदि की इच्छा को रूपक स्वरूप में लें, तो यह सब क्षणभंगुर मायाजाल ही तो है। ‘दुःख की घड़ी में बैठे बेटी, दामाद आदि की पास की उपस्थिति से कथ-अनकथ तोष’ और ‘मेरा दिल पिघल गया’ जैसी अभिव्यक्तियाँं, ‘तुम्हें बहुत दुःखी नहीं होना चाहिए, जो होता है, अच्छे के लिए होता है’ सदृश उद्गार तख्ती पर लिख कर दुःखी नर्स को देना जैसी संवेदनापरक मानवीय प्रतिक्रियाओं को उकेर कर लेखिका स्पष्ट कर देती है कि उसके मनोमस्तिष्क पर भारतीय संस्कार, आचार-विचार अद्यतन सम्प्रभावी हैं। वहीं, ऐसे सारे आचार-व्यवहार को ‘हेलुसिनेशन’ या कि ‘मायाजाल’ का नाम भी देती है लेखिका। भारतीय दार्शनिकों के अभिमत से क्षणभंगुर दुनिया के विविध व्यापार मायाजाल नहीं तो और क्या हैं ? आलोच्य संग्रह की पाश्चात्य जीवन-शैली एवम् भोगवादी प्रवृत्ति की अनेक कहानियाँ मायाजाल को अनकथ रूप में त्याज्य ही घोषित करती हैं। कुछेक कहानियाँ मानवीय सद्गुणों का भी रूपायन करती हैं।
कहानी ‘हबशन’ तुनुकमिज़ाज और स्वयं को सुपर मानने वाली हबशन और रोज़मैरी की मानवीय संवेदना और सो काल्ड मैडकाउ मिसेज स्मिथ की बीमारी में स्वयं बढ़ कर सेवा-सुश्रूषा का शब्दांकन भी कहानी को प्रभावशाली बनाता है। ऐसे शब्दांकन सिद्ध करते हैं कि विदेशी पात्र (विदेशी लोग भी) मानवीय आत्मीयता, करुणा आदि से ओत-प्रोत होते हैं, भले ही ऊपरी तौर पर वे कितना ही अलग-थलग दिखते हों।
और, संग्रह की अति चर्चित कहानी ‘स्पेयर ए थाट प्लीज’ में सहानुभूति, आत्मीयता आदि की लालसा से ललकित मनोविज्ञान को भरपूर रूपांकित किया है लेखिका ने। मानवीय संवेग विशेषकर सहानुभूति की आकांक्षा आदि से ऊभ-चूभ कहानी है यह। अनजाने भय से जूझती कहानी-नायिका एक उपन्यास ‘डेथ ऑफ इंग्लैण्ड’ के बारे में पढ़ कर प्रभावित हो जाती है। उस कृति पर बनी फ़िल्म को देखने के लिए लालायित हो उठती है। वह एक भिखारी द्वारा दूसरी बीमार और बूढ़ी भिखारन को डिस्पोजेबुल गिलास में चाय देते देख कर सहानुभूति से ओत-प्रोत हो जाती है और तबसे उसे चिल्लर देने लगती है। अर्धबेहोशी में अस्पताल में ले जाई जा रही नायिका आनन्दित होती है इसलिए कि वहाँ उसके जैसे बहुत से तन्हा लोग मिलेंगे। वह अर्ध-बेहोशी में भी चाहती है कि सिरहाने कोई कार्ड रखे जिस पर लिखा हो- ‘स्पेयर ए थाट प्लीज़’। वर्तमान की चाक-चिक्य वाली दुनिया में व्यक्ति-दर-व्यक्ति अपने में इतना व्यस्त है कि उसके पास दूसरों के लिए समय नहीं है। लेकिन इसका कुफल आत्मीयता का अभाव और उसी अनुपात में एलीनेशन का तनाव, एक विभीषिका जैसा बन चुका है सारी दुनियाँ में। इस दुःस्थिति को रेखांकित करने में सफल है लेखिका। ‘स्पेयर द थाट .....’ पढ़ने वाले सहृदय संवेदनशील पाठक ऐसी मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत हो जाएँगे अवश्य। यही इस कहानी की सफलता का परिचायक होगा।
कहानी ‘ई-सुलह’ दाम्पत्य-समस्याओं को, विशेषकर तलाक की विभीषिका को, मुखर करने वाली और ऐसी विभीषिका से आशंकित बाल-मनोविज्ञान को नए ढंग से प्रस्तुत करने की कहानी है। नन्हीं बिटिया माँ-बाप के बीच बढ़ते तनाव को लेकर आशंकाओं से भर जाती है। तदैव, वह समस्या का निदान भी अपनी सहेली के साथ मिल कर अपने ढंग से करती है। ‘तलाक के लिए अर्जी ! उसके पहले मुझे कुछ करना होगा’ के निश्चय को साकारित करने के क्रम में बाल-मनोविज्ञान को नए रूप-रंग में सम्प्रस्तुत किया है लेखिका ने। सहेली एप्रिल के मम्मी-पापा पहले ऐसे ही झगड़ते थे। बाद में उनमें तलाक हो गया था। एप्रिल की सहायता से अपने मम्मी-पापा के बीच होने वाले झगड़ों के चलते संभावित तलाक की आशंका को बड़े सहज और सकारात्मक स्वरूप में विलोपित कर दिया नन्हीं बालिका ने। कहानी का प्लाट, बच्चों की बाल-सुलभ सूझ-बूझ और उनके सफल रूपांकन का ताना-बाना पाठक को भटकने नहीं देता। अंत में ‘मम्मी-पापा की खुस-पुस .... हँसने की आवाज’ कहानी को नाटकीय परन्तु सुखांतिक बना देने की लेखिका के हुनर का सफल अक्षरांकन है। अकारण नहीं कि ख्यात कथाकार नासिरा शर्मा इस कहानी पर विशेष रूप से रीझती दिखती हैैं।
कहानी ‘नामर्द’ भी दाम्पत्य सम्बन्धों को लेकर रची गई कहानी है। ‘बीवी से जवाबतल्वी भी नहीं’—ऐसे व्यक्ति के लिए नामर्द का रूपक उचित ही है।
कहानी ‘पंजाबन’ पारिवारिक अपनत्व की बुभुक्षा की कहानी है। दिलफेंक नायक अक्षत नौकरी के बहाने बंगलौर में अमेरिकन लेडी से लिव-इन-रिलेशनशिप के नाम पर रंगरेलियाँ मना रहा है। नायिका अमृता अपनी सास-ननद की सहृदयता के बावजूद ससुराल छोड़ने का निर्णय अंततः ले ही लेती है। अमृता का घर छोड़ते समय दौड़ कर सास के गले लग जाना, रुलाई का छूट जाना .... ऐसे चरम कारुणिक दृश्य असामान्य होते हुए भी कठोर से कठोर मानव-मन को भी पिघला कर रख देंगे। कालान्तर में, दिलोजान से अपनी प्रिंसेस बेटी को चाहने वाले फौजी पापा से सहारा पाकर नायिका अमृता अपने सारे दुखड़ों को छूमंतर कर देती है।
कहानी ‘राधा-राधा’ जेंडर डिस्फोरिया को लेकर रची गई कहानी है। कहानी में दाम्पत्य जीवन की समस्याओं को नए स्वरूप में उकेरा गया है।
कहानी ‘बेक्ड बीन्स’ बूढ़ा-बुढ़िया (वृद्ध माँ-बाप) की समस्या को उकेरती है। पारिवारिक आत्मीयता की ललक इस कहानी में भी मुखर है।
कहानी ‘ढिंढोरा’ राजस्थानी पारिवारिक पृष्ठभूमि की कहानी है जिसमें दाम्पत्य समस्याओं को नए स्वरूप में चित्रांकित किया गया है। भारतीय समाज में विशेषकर परम्परागत परिवारों में ऐसी प्रघटनाएँ आए-दिन दृश्यमान होती रहती है।
‘करारनामा’ संग्रह की पहली कहानी है। ‘करारनामा’ दाम्पत्य को नए कोण से देखती है। ‘करारनामा’ के नाम पर अजीब इकरारनामा। करारनामे के उल्लंघन पर किसी अन्य से दाम्पत्य सम्बन्ध बनाने पर पति/पत्नी द्वारा एक-दूजे को सन्देश देने का इकरारनामा विलक्षण तो है ही, वहीं, ऐसे इकरारनामे में भूल-भ्रम की जो गुंजायश होती है, उसके द्वारा इंगित के क्रम में भी अनकथ रूप में क़लम चलाई है लेखिका ने। नायक नील के हर सन्देश पर आशंकित रहने वाली शंकाकुल पत्नी, ‘नील के लिए शायद यह मेरा प्यार होगा’ के नाम पर प्यार को शक और शंका के चरम तक ले आया। दुर्योग से भूल पत्नी से ही हुई। वहीं, ‘अपनी भूल का भान होते ही 12 वर्षों में पहली बार पति नील के सीने से जाकर लग जाना...’ मर्यादा में थोड़े में बहुत कुछ कह देने का लेखिका का शाब्दिक हुनर उकेरित हो जाता है।
दाम्पत्य सम्बन्धों को लेकर एक और कहानी है ‘कैपचीनो रोमांस’। पाश्चात्य जीवनशैली को रूपायित करने वाली कहानी है यह। इसमें दाम्पत्य सम्बन्धों को सतही रोमांस के रूप में लेने की भारतेतर मानसिकता की पैरवी है। लेकिन ऐसे रोमांस से दाम्पत्य-निष्ठा में जो कमी उत्पन्न होगी और उससे जो दुष्प्रभाव उत्पन्न होंगे—उन पक्षों को सम्भवतः जानबूझ कर अनदेखा किया गया है। ‘अंग्रेजी में हाथ तंग होने की वजह...’ वाक्य का अनूठा मुहावरा भी दृश्यमान है इस कहानी में पृ. 34 पर। इसी तरह ‘संगीन और रंगीन समाचार’ भी विचक्षण मुहावरे के रूप में प्रयुक्त है कहानी-संग्रह में।
परन्तु संग्रह में कहानी के नाम पर प्रस्तुत ‘बाबा-अम्मा और मैं’ वास्तव में कहानी नहीं, अपितु संस्मरणनुमा आलेखन है। नहीं, यह फ़्लैशबैक या मणिकुल्या कहानी भी नहीं है, इसलिए कि इस आलेखन में कहानी कम संस्मरणात्मकता अधिक वाचाल है।
कहानी ‘आशियाना’ भी अस्पताल, डॉक्टर, पूर्ण पक्षाघात क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रस्त मरीज आशा की भावुक मानसिकता की कहानी है। इसमें ‘आशा’ प्रकृतिप्रेमी है और पेशे से नर्स है। सम्प्रति वह पूर्ण पक्षाघात से ग्रस्त है। वहीं, गम्भीर बीमार माँ की देखभाल न करनी पड़े—इस कारण उसका पुत्र प्रभात ‘युथेनेसिया’ (लाइलाज मरीज को परिवारजनों की सहमति से मृत्यु प्रदान करने का सिद्धान्त) से आग्रस्त हो जाता है। कहानी में नायिका आशा के प्रकृति-प्रेम का सुन्दर रूपांकन है। ‘उन्नावी पत्ती’, ‘लालवेरीज वाली नारंगी गुच्छे’ आदि के प्रयोग कहानी के कथ-कथ्य को आकर्षक बना देते हैं। जूडी, केशव, आशा के ‘ट्राएंगल’ से जूझती कहानी में जीवनसाथी की उदासीनता का (सार्थक) प्रतिवाद सकारात्मक रूप से कैसे दिया जा सकता है—इसका इंगित भी है।
कहानी ‘हिमखण्ड’ भी अस्पताली वातावरण डॉक्टर, नर्स आदि से रची-बसी कहानी है। यह कहानी-नायक डॉ. शान की सेक्स की हवस को उकेरने वाली कहानी है। कहानी का आरम्भिक संवाद “भूल कभी इकहरी नहीं होती। एक के बाद दूसरी, तीसरी भूलें अपने शिकार को घेर कर आक्रमण करती हैं, उसे किसी लायक नहीं छोड़तीं।“—एक भयानक कटु सत्य को साकार कर देता है। अपने में न जाने कितने हिमखण्ड (आइसबर्ग) समाए रखने वाले डॉ. शान के अस्पताल की हेड नर्स कहानी के अंत में डॉ. शान को उसके अपने ही अस्पताल से खींचते हुए कमरे से बाहर कर देती है। बच्ची श्रुति का इलाज शुरू करने के लिए डॉ. शान को कमरे से बाहर करना मानवीय दृष्टि से आवश्यक था। हेड नर्स ने वही किया। यद्यपि आत्ममुग्ध डॉ. शान अपने कदाशय में श्रुति की माँ पद्मा को न्यूरोटिक घोषित करता है, लेकिन हेड नर्स सच्चाई को भाँप लेती है और तदनुसार डॉ. शान को कमरे से बाहर करके ही बच्ची का इलाज करने का निर्णय लेती है। कहानी का सार-संदेश उपरि-अंकित प्रथम वाक्य में ही स्पष्ट है।
‘बेचारी सिनथिया’ शीर्षक कहानी हायसिंथ के ‘बेचारी सिनथिया’ बनने की कहानी है। ब्रिटिश परिवार के आपसी सम्बन्धों के ताने-बाने पर बुनी गई कहानी है ‘बेचारी सिनेथिया’। हायसिंथ अपनी माँ ईडिथ की ‘सिनथिया’ है, ‘पापा की थियो’ है। वह स्वभाव से घुन्नी है। ब्रिटिश समाज में एक नहीं, अनेक गर्लफ्रेंड्स से मौज-मस्ती की मानसिकता वाले ‘फ्रेंड्स’ परस्पर गद्दारी भी करते हैं। हायसिंथ के साथ हुई ऐसी गद्दारी का राज़ सभी के लिए ज़ाहिर हो गया था। इसी के फलित रूप में हायसिंथ को ‘बेचारी सिनथिया’ बनना पड़ता है। यह कहानी ‘डीसेंट ब्रिटिश होने’ के थोथी भाव-भूमि वाले गोरों के सुपीरियारिटी काम्प्लेक्स को प्रदर्शित और उसके थोथेपन को भी इंगित करती है। कहानी के अन्त के वाक्यों में ऐतिहासिक सच्चाई है- ”वी आर डीसेन्ट ब्रिटिश पीपुल यू नो? ईडिथ जान गई थी कि अब इस वाक्य का कोई अर्थ नहीं रह गया है; किन्तु उसे यह अवश्य लगता है कि बदतमीज़ और बेतहज़ीब लोगों ने उसका अपर क्लास का तमगा छीन लिया है।” इतने खुले शब्दों में ‘ब्रिटिश पीपुल के तमगा छिन जाने’ को साहसपूर्वक जगज़ाहिर करती हैं लेखिका दिव्या माथुर। ब्रिटेन में प्रवास करते हुए भी ब्रिटिश पीपुल से सुपीरियारिटी का तमगा छिन जाने के सत्य को बेबाकी से उकेरने वाले बेबाक बोलों के लिए विशेष बधाई देनी होगी लेखिका को।
संग्रह की कहानी ‘उसका नाम’ में एक सुपरस्टोर में कहानी-नायक गैरी शिष्टाचारवश एक अनजान महिला को एक पौण्ड देकर उसकी मदद कर देता है। उसे उस महिला का नाम तक पता नहीं। कहानी के अंत तक भी उसे उस महिला का नाम ज्ञात नहीं हो पाता। उसे केवल उसके डेढ़-दो वर्षीय बेटे शिवा का नाम ही ज्ञात है। कालान्तर में गैरी को रास्ते में वह महिला अपने बेटे के साथ सुपरस्टोर की ओर जाती हुई दिख जाती है। तभी एक अधेड़ व्यक्ति उस महिला का पीछा कर उसे पकड़ लेता है। महिला ‘हेल्प-हेल्प’ पुकारती है। गैरी महिला को बचाना चाहता है। अधेड़ व्यक्ति गैरी को चाकू से घायल कर उसे महिला की मदद करने से रोकना चाहता है। यह देख कर महिला अधेड़ और गैरी के बीच आ जाती है। फलतः चाकू उस महिला की पीठ से आर-पार हो जाता है। गैरी की शर्ट मृत महिला के खून से तर-बतर हो जाती है। लेकिन गैरी उसके बेटे शिवा की देखभाल के लिए चिन्तित है। गैरी शिवा को गोद लेने का मन बना लेता है। इस प्रकार कहानी में मानवीय संवेगों का प्रशंसनीय चित्रण हुआ है।
संग्रह की एक अन्य कहानी है ‘ई-रिश्ता’। ‘मायाजाल’ की अधिकांश कहानियों की तरह इस कहानी में भी पाश्चात्य जीवन-शैली का, भोगवादी जीवनाचार का, ड्रग्स आदि के नशे से युक्त उन्मुक्त यौन-जीवन का कहानीकरण है। ख्यात साहित्यकार अनिल जोशी के शब्दों में ‘पाश्चात्य जीवनाचार का दस्तावेज़ या दस्तावेज़ीकरण’ है यह कहानी। ‘ई-रिश्ता’ का नायक तलाकशुदा पूर्वपत्नी कैमिला और बिन्दास दोस्त नायिका कैरन में से किसी को नहीं पा सका। दोनों ही इस बहाने-उस बहाने अपनी-अपनी राह चली गईं और नायक महोदय उनके टेलिफोनिक सन्देश की प्रतीक्षा ही करते रह गए। कहानी की पंक्तियाँ ”फोन के रिश्तों का क्या भरोसा! जब चाहे जोड़ लिया, जब चाहे तोड़ दिया“ अत्यन्त मार्मिक है। उनसे मनसा कचोट ही मुखरमान होती है।
यहीं कहना असमीचीन नहीं कि भारतीय मनस्विता की लेखिका होने के ब्याज से दिव्या जी संभवतः पाश्चात्य जीवनाचार को निस्सार और निरर्थक ही मानती हैं। वे दुःखान्त कहानीकार नहीं हैं। तदेव, उनकी कहानियों में पाश्चात्य जीवनाचार के दुःखान्तक फलित कुण्ठा, अवसाद, वीभत्सता आदि प्रायः कम शब्दांकित होते हैं। तदपि अपनी कहानियों में ऐसे जीवनाचार की निरर्थकता तो उद्भासित कर ही देती हैं वे। ऐसी कहानियों के संग्रह का नाम ‘मायाजाल’ भी रूपक स्वरूप में पाश्चात्य जीवनाचार की निस्सारता और निरर्थकता दोनों को ही प्रकारान्तर से इंगित करता है। आलोच्य कहानियों के संग्रह का नाम ‘मायाजाल’ इस दृष्टि से एक सफल नामकरण है।
कहानी-संग्रह ‘मायाजाल’ की कहानियाँ आधुनिक युग के मायाजाल की, साथ ही पारिवारिक आत्मीयता की तलाश की, दाम्पत्य की विसंगतियों में जूझने की, तलाक की विभीषिका से आहत मासूम बचपन की और कुल मिला कर मानवता, मानवीयता को बचाने की जद्दोजहद की कहानियाँ हैं। सहृदय पाठक के सुमनस् मन को झकझोरने में सक्षम हैं संग्रह की कहानियाँ। सटीक शब्द-चयन, यथावश्यकता नए-नए प्रतीकात्मक शब्दों के साथ-साथ ‘खुसपुस’ जैसे सशक्त शब्दों का गढ़न और उसका सार्थक सम्प्रयोग प्रभावशील है। इस प्रकार, नितान्त पारिवारिक और सामान्य मानवीय संवेगों से आभरित आलोच्य कहानी-संग्रह ‘मायाजाल’ अति सशक्त कहानियों का संग्रह है। इसमें मानवीयता और मानवीय रिश्तों की कोमल भावनाएँ अत्यन्त वाचाल हैं। ऐसी वाचालता यथार्थ की भूमि पर श्रेष्ठ मानवीय संवेगों को साकार करती हैं।
‘मायाजाल’ की कहानियों की भाषा सहज बोलचाल की प्रवाहशील भाषा है। कहानियों के पात्र भारत, यूरोप, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया के हैं, लेकिन सभी की मानवीय संवेदनाएँ, प्रत्युत सभी के मानवीय संवेग, एक जैसे हैं—‘मायाजाल’ की कहानियाँ यह भी कहती हैं। इस तरह भी आलोच्य कहानी-संग्रह का नाम ‘मायाजाल’ रखा जाना उचित प्रतीत होता है।
कविता, कहानी, उपन्यास आदि बहुवर्णी विधाओं में लेखन करने वाली दिव्या माथुर प्रवासी जगत् ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण हिन्दी जगत् की विचक्षण प्रभावशाली रचनाधर्मी लेखिका हैं। उनका लेखन साहित्य, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं का जीवन्त दस्तावेज है। ‘मायाजाल’ की कहानियाँ भी प्रथमदृष्टया ऐसे दस्तावेजों के स्थायीभाव की प्रमाणक है वैयक्तिक स्वरूप में प्रतीततया संवेद्य यायावरी प्रकृति से आभरित होने से लेखिका विश्व भर के मानव समुदाय से सीधे-सीधे बावस्ता रहती हैं। इसका सम्प्रभाव उनके लेखन पर अपनी भरपूर छाप छोड़ता है। यथार्थ की वस्तुभूमि से तथ्य (विशेषकर मनोवैज्ञानिक संवेदनापरक तथ्य) उठा कर उसमें अपनी व्यंजनापरक काल्पनिकता का रंग भर उन्हें कहानियों का रूप दे देती हैं वे। काल्पनिकता के रंगों से भरी कहानियाँ ऐसी हैं कि वे पाठक की मानवीय संवेदनाओं को गुदगुदाने के बजाय उद्बोधित करने में समर्थ हैं। ऐसा विशिष्टरंगी आरेखन है दिव्या माथुर के लेखन का। उनकी कमश्रेष्ठ कहानियाँ भी सुमनस् पाठक को अपने प्रवाह से एकतान एकलय करने में समर्थ होती हैं। ‘मायाजाल’ की कहानियाँ ‘हबशन’ आदि लेखक-पाठक की एकलयता को साकारित करती हैं। उनके स्त्री पात्र (और पुरुष पात्र भी) अपनी जिजीविषाओं के बल पर जीवन की काली-पीली, हरी-लाल परिस्थितियों से जूझ कर, उनमें विजयी होकर ‘स्वयं का सशक्त होना’ प्रमाणित करते हैं। वे स्वतंत्र निर्णय लेते हैं प्रायः अप्रत्याशित सा। वे अपने निर्णयों के काले, हरे, वसन्ती फल के लिए कभी पछताते नहीं। भले ही वे नार्सिस्ट न हों, भले ही उनके जीवन में चटपटे शरारे न दिखें, तो भी अपने वर्तमान से दो-दो हाथ करने में हिचकते नहीं दिव्या जी के पात्र। यह प्रवृत्ति संभवतया लेखिका के स्वयं के जुझारुपन का, उनकी सर्वदा विजयिनी जिजीविषा का प्रत्यक्ष फलित है। इसीलिए सन्नाटे का शोर न सही, तो भी सन्नाटे की आवाज़ को विशिष्ट बुनावट में वाचाल करने की कहानी-कला से भी आभरित हैं ‘मायाजाल’ की कहानियाँ।
कुल मिला कर कहानी-संग्रह ‘मायाजाल’ में संगृहीत कहानियाँ न केवल रोचक और पठनीय हैं वरन् वे ऐसे गवाक्ष भी हैं उनमें जिनसे हम व्यवहारविदता, शिवेतर की क्षति आदि से अनकथ रूप में अवगत हो जाते हैं। जीवन जीने की विशिष्ट दिशा भी दिख जाती है संवेदनशील साहित्य-साधिका दिव्या माथुर के लेखन से। कहानी-संग्रह ‘मायाजाल’ दिव्या माथुर के परम्परागत श्रेष्ठ लेखन-सौष्ठव को पुनः-पुनः साकार करता है।
निस्सन्देह, कहानी-संग्रह ‘मायाजाल’ का सहृदय पाठक-वृन्द द्वारा खुले हृदय से स्वागत किया जाएगा, सम्प्रति ऐसी आशा की जा सकती है। एतदर्थ मेरी शुभकामनाएँ!
समीक्षक: विजय रंजन