किरणों के रूप 

15-01-2026

किरणों के रूप 

प्रणव राज (अंक: 292, जनवरी द्वितीय, 2026 में प्रकाशित)

 

सूर्य निकला बादलों की चादर में से, 
निकला सूर्य लोरी गा के, सोने के लिए नहीं, 
जगाने के लिए बिस्तर पर से, 
सूर्य निकला, क्षितिज में से नहीं, बादलों की चादर में से। 
 
सूर्य निकला उच्च गगन से, 
चलता-चला गया पहाड़ों से, नदियों के किनारों से, 
रुक गया कहीं, 
फिर उगा खिड़की से, 
जाकर टकराया बिस्तर पर लेटी आँखों से। 
 
उसको चुभती सूर्य की किरणें, 
पर, लुभाती उनको जो बैठे खेतों की मेड़ पे, 
लगाकर गले सुलगती किरणें, 
ठंड में राहत, बरसात में प्यारी किरणें। 
 
किरणें निकली बादलों में से, 
उत्साह जगाती, लोरी गाती, 
इस बार गाती सुलाने के लिए बिस्तर पे, 
चाँद का स्वागत करती किरणें छुप जाती बादलों में। 

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