किरण एक आशा की ‘माँ’
वर्षा भारतीया
तुमने सारा जीवन समर्पण किया हमारे लिए,
और हमने क्या किया तुम्हारे लिए,
बस यही सोचती रहती
कि क्या मैं थक गयी
संघर्ष के पथ पर चलते चलते
हाँ बहुत थक गयी हूँ . . .!
पर कैसे कहूँ?
क्या मैं इतना भी न कर सकी तुम्हारे लिए!
धिक्कार! मेरे होने पर जब
मैं तुम्हारे लिए कुछ न कर सकी।
धिक्कार! जो मैं
अपने कर्त्तव्य का पालन न कर सकी,
व्यर्थ है मेरा जीवन . . .!
टूटकर बिखर-सी गयी हूँ मैं,
जैसे परिंदा तो है, लेकिन पंख नहीं!
जब भी सोचती,
तुम्हारा चेहरा दिखाई देता,
जिन आँखों में समंदर सी गहराइयाँ हों!
जिनके शब्द मौन हो चुके हों,
आँखें धूमिल-सी हो गयी हों . . .
जो बहुत-सी यातनाएँ झेलकर भी,
कुछ कहना चाह रही हो . . .!!!